World Suicide Prevention Day: तकनीक भी बन सकती है जीवन बचाने का सहारा

हर साल 10 सितंबर को दुनिया भर में वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे यानी विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इस साल का थीम है – “Changing the Narrative on Suicide” यानी आत्महत्या को लेकर सोच को बदलना। इस दिन का मकसद है लोगों में जागरूकता बढ़ाना, आत्महत्या से जुड़ी झिझक और कलंक को कम करना और यह संदेश देना कि आत्महत्या रोकी जा सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल दुनिया में 7 लाख 20 हजार से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। अनुमान है कि हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। युवाओं में यह तीसरा सबसे बड़ा मृत्यु का कारण है। भारत में स्थिति और गंभीर है। एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) की रिपोर्ट (2022) बताती है कि देश में आत्महत्या दर 2017 में 9.9 प्रति लाख आबादी से बढ़कर 2022 में 12.4 प्रति लाख हो गई। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित 18 से 30 साल के युवा (35%) रहे। इसके बाद 30 से 45 साल के लोग (32%) का नंबर आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक आत्महत्या रोकने में मददगार हो सकती है। कई ऐप्स और चैटबॉट्स 24 घंटे मुफ्त और गुप्त रूप से मदद उपलब्ध कराते हैं। एआई (Artificial Intelligence) अब सोशल मीडिया पोस्ट और सर्च ट्रेंड्स को देखकर शुरुआती चेतावनी भी दे सकती है। वहीं, स्मार्टवॉच जैसी डिवाइस हार्ट रेट और नींद के पैटर्न में बदलाव को ट्रैक कर सकती है, जिससे मानसिक परेशानी का पता चल सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक मदद जरूर कर सकती है, लेकिन यह मानवीय सहानुभूति, परामर्श और पेशेवर इलाज का विकल्प नहीं हो सकती।
भावनात्मक संकट से गुजर रहे लोग जब मदद चाहते हैं तो हेल्पलाइन नंबर और ऐप्स उनके लिए जीवनरक्षक साबित हो सकते हैं। भारत में आसरा (AASRA) और स्नेही (Snehi) जैसी 24×7 हेल्पलाइन हर दिन हजारों कॉल्स रिसीव करती हैं और प्रशिक्षित काउंसलर्स तुरंत सहायता उपलब्ध कराते हैं।
आज कई चैटबॉट्स और एआई-आधारित ऐप्स भी उपलब्ध हैं –
Wysa और YourDOST जैसे प्लेटफॉर्म चिंता, अकेलापन या आत्महत्या के विचारों से जूझ रहे लोगों को तुरंत चैट सपोर्ट देते हैं।
myShakti, भारत का पहला स्वदेशी एआई चैटबॉट है, जो भारतीय डेटा पर आधारित है।
Healo और Sukoon जैसे प्लेटफॉर्म एआई के साथ-साथ ह्यूमन थेरेपिस्ट को भी जोड़ते हैं।
फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी पोस्ट्स और कमेंट्स को स्कैन कर आत्महत्या के संकेत मिलने पर यूज़र्स को क्राइसिस हेल्पलाइन की ओर निर्देशित करते हैं।
आत्महत्या एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। लेकिन समय पर मदद, तकनीक का सही उपयोग और समाज की संवेदनशीलता मिलकर कई ज़िंदगियाँ बचा सकती हैं।





