मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर राहुल गांधी का असहमति पत्र

लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मंगलवार को नए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति की प्रक्रिया पर कड़ी असहमति जताई और चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले की आलोचना की. उन्होंने काह कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करके और मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से “हटाकर” सरकार ने हमारी चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर करोड़ो मतदाताओं की चिंताओं को बढ़ा दिया है.
17 फरवरी को सरकार ने राजीव कुमार की जगह ज्ञानेश कुमार को नया मुख्य चुनाव आयुकत नियुक्त किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली समितित में शामिल लोकसभा के नेता ने अपना असहमति पत्र प्रस्तुत करते हुए चयन प्रक्रिया को “अपमानजनक और अशिष्ट” बताया. कांग्रेस नेता ने एक्स पर साझा किए गए अपने असहमति पत्र में कहा, “सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करके और भारत के मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाकर, मोदी सरकार ने हमारी चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी को लेकर करोड़ों मतदाताओं की चिंताओं को और बढ़ा दिया है.”
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “अगले चुनाव आयुक्त का चयन करने वाली समिति की बैठक के दौरान, मैंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को एक असहमति पत्र सौंपा, जिसमें कहा गया था: कार्यकारी हस्तक्षेप से मुक्त एक स्वतंत्र चुनाव आयोग का सबसे बुनियादी पहलू चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनने की प्रक्रिया है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करके और भारत के मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाकर, मोदी सरकार ने हमारी चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर करोड़ों मतदाताओं की चिंताओं को बढ़ा दिया है…”

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करके और भारत के मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाकर, मोदी सरकार ने हमारी चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर करोड़ों मतदाताओं की चिंताओं को और बढ़ा दिया है.
विपक्ष के नेता के रूप में यह मेरा कर्तव्य है कि मैं बाबासाहेब अंबेडकर और हमारे राष्ट्र के संस्थापक नेताओं के आदर्शों को कायम रखूं और सरकार को जवाबदेह ठहराऊं. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री द्वारा नए मुख्य चुनाव आयुकत का चयन करने का आधी रात को निर्णय लेना अपमानजनक और अशिष्टतापूर्ण है, जबकि समिति की संरचना और प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा रही है और इस पर अड़तालीस घंटे से भी कम समय में सुनवाई होनी है.




