
Dhamaal 4 Review: अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी और जावेद जाफरी स्टारर ‘धमाल 4’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। लंबे इंतजार के बाद आई इस कॉमेडी फ्रेंचाइजी से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरती नजर नहीं आती। कमजोर कहानी, पुराने अंदाज के चुटकुले और फीकी कॉमेडी के कारण यह फिल्म दर्शकों को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाती।
एक बार फिर ट्रेजर हंट की कहानी
‘धमाल 4’ की कहानी एक बार फिर खजाने की तलाश के इर्द-गिर्द घूमती है। पहले पार्ट में जहां खजाना “W के नीचे” था, वहीं इस बार पूरी कहानी “M के नीचे” छिपे खजाने पर आधारित है।
हालांकि कहानी में नया कुछ देखने को नहीं मिलता और फिल्म पहले भाग की तरह ही आगे बढ़ती दिखाई देती है।
पहले हाफ में नहीं जमी कॉमेडी
फिल्म का पहला भाग कई किरदारों और सब-प्लॉट से भरा हुआ है, लेकिन इनमें से ज्यादातर दर्शकों को हंसाने में सफल नहीं होते। कई जगह कॉमेडी की जगह केवल शोर-शराबा और ओवरएक्टिंग देखने को मिलती है।
पुराने जमाने के वन-लाइनर और बॉडी शेमिंग वाले मजाक आज के दौर में असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं।
दूसरे हाफ में भी नहीं बदली रफ्तार
दूसरे हाफ में भी फिल्म कहानी के स्तर पर ज्यादा कुछ नया नहीं कर पाती। मेकर्स ने विजुअल इफेक्ट्स (VFX) पर काफी ध्यान दिया है, लेकिन कॉमेडी और स्क्रीनप्ले कमजोर नजर आता है।
फिल्म के गाने भी खास प्रभाव नहीं छोड़ते और कई जगह दोहराव महसूस होता है।
कलाकारों की एक्टिंग कैसी रही?
रितेश देशमुख फिल्म के सबसे मजबूत कलाकार साबित होते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग कई जगह मुस्कुराने पर मजबूर करती है।
वहीं अजय देवगन का अभिनय इस बार काफी साधारण नजर आता है। अरशद वारसी और जावेद जाफरी अपनी पुरानी जादुई केमिस्ट्री दोबारा नहीं बना पाए हैं।
संजय मिश्रा को भी ऐसा किरदार मिला है, जो दर्शकों पर खास असर नहीं छोड़ता। वहीं अंजलि आनंद और संजीदा शेख के हिस्से में सीमित और कमजोर भूमिकाएं आई हैं।
क्या देखें ‘धमाल 4’?
अगर आप सिर्फ हल्की-फुल्की कॉमेडी और इस फ्रेंचाइजी के बड़े प्रशंसक हैं, तो फिल्म एक बार देख सकते हैं। लेकिन यदि आप पहले पार्ट जैसी ताजगी और दमदार हास्य की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।
फिल्म का फैसला
‘धमाल 4’ अपनी पुरानी सफलता को दोहराने में सफल नहीं दिखती। कहानी, कॉमेडी और स्क्रीनप्ले में नया प्रयोग नहीं होने के कारण फिल्म कई जगह कमजोर पड़ जाती है। रितेश देशमुख का प्रदर्शन जरूर फिल्म की सबसे बड़ी सकारात्मक बात है, लेकिन अकेले उनके दम पर पूरी फिल्म संभलती नजर नहीं आती।





