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हिमंत बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर: कांग्रेस से BJP तक, दूसरी बार संभालेंगे असम की कमान

असम की राजनीति में सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले Himanta Biswa Sarma मंगलवार को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले सरमा आज न सिर्फ असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर में BJP के सबसे बड़े रणनीतिक चेहरों में शामिल हो चुके हैं।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीति में एंट्री छात्र जीवन के दौरान हुई। 1990 के दशक में उनका जुड़ाव कांग्रेस से हुआ और 2001 में उन्होंने पहली बार जलुकबाड़ी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर असम विधानसभा में कदम रखा।

कांग्रेस सरकार में उन्होंने स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा और लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। प्रशासनिक पकड़ और तेज राजनीतिक शैली के कारण वह जल्द ही पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे।

तरुण गोगोई के करीबी से राजनीतिक मतभेद तक

पूर्व मुख्यमंत्री Tarun Gogoi के कार्यकाल में हिमंत सरमा को उनका भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था। लेकिन समय के साथ कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद बढ़ने लगे।

राजनीतिक गलियारों में हिमंत सरमा को तरुण गोगोई का संभावित उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। हालांकि बाद में पार्टी के अंदर गुटबाजी और नेतृत्व विवाद गहराया। इसी दौरान गौरव गोगोई की सक्रियता बढ़ने से भी असंतोष की चर्चा तेज हुई।

2015 में BJP में शामिल होकर बदली राजनीतिक दिशा

2015 में हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़कर BJP जॉइन कर ली। इसे असम की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस उस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पाई।

BJP में शामिल होने के बाद सरमा ने सिर्फ असम ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वोत्तर में पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। चुनावी रणनीति, संगठन विस्तार और गठबंधन राजनीति में उनकी पकड़ ने उन्हें केंद्रीय नेतृत्व का भरोसेमंद चेहरा बना दिया।

2021 में पहली बार बने असम के मुख्यमंत्री

2021 में Himanta Biswa Sarma पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में Orunodoi और Nijut Moina जैसी योजनाओं ने महिलाओं और गरीब तबकों के बीच BJP की पकड़ मजबूत की।

सरमा लगातार जनता के बीच सक्रिय दिखाई दिए और उनकी तेज प्रशासनिक शैली चर्चा में रही।

विवादों से भी रहा गहरा नाता

मुख्यमंत्री के रूप में हिमंत सरमा कई विवादों में भी रहे। अवैध घुसपैठ, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और Citizenship Amendment Act (CAA) जैसे मुद्दों पर उनके फैसलों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ी।

समर्थकों का कहना है कि उन्होंने असम की पहचान और सुरक्षा के मुद्दों को मजबूती से उठाया, जबकि आलोचकों ने उन पर ध्रुवीकरण की राजनीति करने के आरोप लगाए।

दूसरी पारी में बढ़ी जिम्मेदारियां

दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हिमंत बिस्वा सरमा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती चुनावी वादों को जमीन पर उतारने की होगी। खासकर अवैध प्रवासन, CAA और विकास से जुड़े मुद्दों पर उनकी सरकार की कार्यशैली पर पूरे देश की नजर रहेगी।

असम के राजनीतिक इतिहास में वह दूसरे कार्यकाल तक पहुंचने वाले पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन गए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक पकड़ और प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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