ममता के करीबी से BJP के बड़े चेहरे तक, ऐसा रहा शुभेंदु अधिकारी का सफर

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा नाम बन चुके शुभेंदु अधिकारी कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे। हालांकि, समय के साथ उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया और राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लेकर आए।
शुभेंदु अधिकारी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत काफी पहले कर दी थी। शुरुआती दिनों में उन्होंने RSS शाखाओं में प्रशिक्षण लिया। इसके बाद 1980 के दशक के आखिर में उन्होंने कांग्रेस की छात्र इकाई छात्र परिषद के जरिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा।
उनकी पहली चुनावी सफलता साल 1995 में मिली, जब वह कांथी नगरपालिका से पार्षद चुने गए। इसके बाद 1999 में उन्होंने अपने पिता के साथ नवगठित तृणमूल कांग्रेस जॉइन कर ली।
हालांकि, शुरुआती दौर में उन्हें कुछ चुनावी हार का भी सामना करना पड़ा। वह 2001 विधानसभा चुनाव और 2004 लोकसभा चुनाव हार गए थे। लेकिन 2006 में कांथी विधानसभा सीट जीतकर उन्होंने बड़ी वापसी की।
शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक कद 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोध आंदोलन के दौरान तेजी से बढ़ा। इस आंदोलन में वह सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों के खिलाफ आंदोलन का बड़ा चेहरा बनकर उभरे।
बाद में उन्होंने तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया और 2009 व 2014 में तमलुक लोकसभा सीट से जीत दर्ज की।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2011 के बाद ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव बढ़ने के साथ शुभेंदु अधिकारी और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। पार्टी में अहम जिम्मेदारियां संभालने के बावजूद उनके और शीर्ष नेतृत्व के रिश्तों में तनाव बना रहा।
2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के खराब प्रदर्शन और पार्टी के ऑब्जर्वर सिस्टम खत्म होने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने बीजेपी जॉइन कर ली। उनका यह फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना गया।





