Chandrayan-4 की तैयारी: भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाया चंद्रमा की ‘टाइटेनियम’ वाली चट्टानों का रहस्य

नई दिल्ली: इसरो (ISRO) के आगामी महत्वाकांक्षी मिशन ‘Chandrayan-4‘ को लेकर एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता मिली है। IIT Kharagpur और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अहमदाबाद के शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की सतह पर पाई जाने वाली टाइटेनियम युक्त चट्टानों (Titanium-rich basalts) के निर्माण की गुत्थी को सुलझा लिया है। यह अध्ययन Chandrayan-4 के लैंडिंग स्थल के चयन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
चंद्रमा पर टाइटेनियम की प्रचुरता
चंद्रमा की सतह प्राचीन लावा प्रवाह से ढकी हुई है, जिन्हें ‘लूनर बेसाल्ट’ कहा जाता है। पृथ्वी की तुलना में ये चट्टानें काफी अलग हैं। जहाँ पृथ्वी की ज्वालामुखीय चट्टानों में Titanium Dioxide की मात्रा आमतौर पर 2% से कम होती है, वहीं चंद्रमा की कुछ चट्टानों में यह 18% तक पाई गई है। वैज्ञानिक दशकों से इस अंतर के पीछे के कारणों को समझने की कोशिश कर रहे थे।
शोध में क्या आया सामने?
‘जियोचिमिका एट कॉस्मोचिमिका एक्टा’ में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, वैज्ञानिकों ने प्रायोगिक तौर पर यह बताया है कि चंद्रमा की गहराई में स्थित खनिज किस प्रकार उच्च टाइटेनियम वाली मैग्मा में परिवर्तित हुए। शोधकर्ताओं ने पाया कि इल्मेनाइट (Ilmenite), जो कि टाइटेनियम-आयरन ऑक्साइड खनिज है, चंद्रमा के इतिहास के प्रारंभिक चरणों में विशिष्ट तापमान और दबाव की स्थितियों में चट्टानों के साथ मिश्रित हुआ।
Chandrayan-4 के लिए क्यों है अहम?
इसरो का Chandraya-4 मिशन वर्ष 2028 के लिए प्रस्तावित है, जिसका मुख्य उद्देश्य चंद्रमा से नमूने (Sample Return) इकट्ठा कर पृथ्वी पर वापस लाना है। इस शोध के निष्कर्ष वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेंगे कि चंद्रमा के किन क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जा सकते हैं। टाइटेनियम न केवल वैज्ञानिक शोध के लिए जरूरी है, बल्कि यह भविष्य के चंद्र उपनिवेशों के लिए एक मूल्यवान संसाधन भी हो सकता है।





