अयोध्या में फिर जीवित हुआ त्रेतायुग! राम मंदिर पर सजे कोविदार वृक्ष की अद्भुत कहानी

अयोध्या: अयोध्या स्थित श्री राम मंदिर में एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धर्मध्वज फहराया. इस महत्वपूर्ण समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंचालक मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे. ध्वजारोहण समारोह के पश्चात पीएम मोदी ने रामभक्तों को विशेष संबोधन दिया.
पीएम मोदी का भावुक संबोधन
रामभक्तों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “इस पल पूरा भारत और संपूर्ण विश्व राममय हो गया है. प्रत्येक रामभक्त के मन में अद्भुत संतोष, असीम कृतज्ञता और अपार दिव्य आनंद का भाव है. आज वो घाव भर रहे हैं जो सदियों से रिस रहे थे. सदियों की पीड़ा आज समाप्त हो रही है. जो संकल्प सदियों से लिया गया था, वह आज सफल हो रहा है. यह उस महायज्ञ की परिणति है जिसकी ज्वाला 500 वर्षों तक जलती रही. यह वह यज्ञ है जो एक क्षण के लिए भी आस्था से विचलित नहीं हुआ और विश्वास से टूटा नहीं.”
कोविदार वृक्ष: ध्वज का प्रमुख प्रतीक
ध्वज के निर्माता ललित मिश्रा के अनुसार, कोविदार वृक्ष को ध्वज में शामिल करना केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति की महत्ता का भी प्रतीक है. त्रेता युग के इस पवित्र वृक्ष को ध्वज पर उकेरना ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है.
ध्वज का निर्माण गुजरात में किया गया है और इसमें विशेष किस्म के कपड़े का इस्तेमाल हुआ है. यह कपड़ा इस प्रकार बनाया गया है कि धूल, मिट्टी और बारिश का इस पर न्यूनतम प्रभाव पड़े. मौसम की किसी भी स्थिति में यह ध्वज स्वच्छ और तेजस्वी बना रहेगा.
मान्यताओं के अनुसार, कोविदार प्राचीनकाल का प्रथम हाइब्रिड पेड़ था, जिसे ऋषि कश्यप ने मंदार और पारिजात के संयोग से निर्मित किया था. इस वृक्ष पर बैंगनी रंग के मनमोहक सुगंधित पुष्प खिलते हैं. इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि इसे अत्यंत दिव्य और मंगलकारी बनाती है, यही कारण है कि इसे राम ध्वज में पुनः स्थान दिया गया है.
त्रेतायुग का राजचिन्ह
त्रेतायुग में कोविदार वृक्ष अयोध्या की राजसत्ता का प्रतीक चिन्ह था. यह राम राज्य की शक्ति, पराक्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था. त्रेतायुग के बाद अब कलियुग में पुनः अयोध्या के राम मंदिर के मुख्य शिखर पर स्थापित यह कोविदार वृक्ष राम राज्य के आदर्शों की स्मृति को जीवित रखेगा.
वाल्मीकि रामायण में उल्लेख
डिजाइनर ललित मिश्रा ने बताया, “यह ध्वज अचानक खोजा गया. मैंने मेवाड़ की चित्रित रामायण के एक चित्र में अयोध्या का यह ध्वज देखा. वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में मुझे इस ध्वज का उल्लेख मिला. ध्वज पर अंकित पेड़ मंदार और पारिजात का संकर है, जिसे ऋषि कश्यप ने बनाया था, यह वनस्पतियों के संकरण के प्रारंभिक प्रयोगों में से एक हो सकता है. कोविदार और कचनार के पेड़ की पहचान में मुझे कठिनाई हुई क्योंकि दोनों का वैज्ञानिक नाम समान था. मुझे प्रसन्नता है कि इतने लंबे समय बाद यह ध्वज अपने मूल स्थान पर वापस लौट आया है जहां से इसकी शुरुआत हुई थी.”
ध्वज की विशेषताएं
यह ध्वज केवल धार्मिक आस्था से नहीं जुड़ा है, बल्कि भारतीय अध्यात्म, इतिहास और पर्यावरणीय संदेशों की गहराई भी समेटे हुए है. विशिष्ट डिजाइन वाले इस ध्वज की लंबाई 11 फीट और चौड़ाई 22 फीट है, जो अपने आप में भव्य और विलक्षण है.
ध्वज को आधुनिक तकनीकी और पारंपरिक भावनाओं के मिश्रण से तैयार किया गया है, जिससे यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि शास्त्रीय संदर्भों का भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है.
तीन मुख्य प्रतीक
ध्वज में तीन प्रमुख प्रतीकों – ॐ, सूर्य और कोविदार वृक्ष को उकेरा गया है, जो इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मानी जा रही है.
सूर्य भगवान राम के सूर्यवंशी होने का प्रतीक है, जो वीरता, तेज और शक्ति की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं ॐ सनातन संस्कृति की अध्यात्मिकता, अनंतता और सतत गतिशीलता का प्रतीक है.
डिजाइनर ललित मिश्रा स्पष्ट करते हैं कि ‘ॐ’ का समावेश यह संदेश देता है कि सनातन कभी नष्ट नहीं होता, न ही समाप्त होता है, वह निरंतर परिवर्तन और रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ता रहता है.
सबसे चुनौतीपूर्ण लेकिन महत्वपूर्ण कार्य था कोविदार वृक्ष की पहचान करना. त्रेतायुग के इस वृक्ष का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में, खासकर अयोध्या कांड में, अनेक बार मिलता है.





