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“मैं आज सोनम वांगचुक से मिलने जाऊंगी”: सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर अतिशी

दिल्ली पुलिस ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और उनके समर्थक को सोमवार रात सिंघु बॉर्डर पर हिरासत में ले लिया. 1 सिंतंबर को सोनम वांगचुक ने लेह से ‘दिल्ली चलो मार्च’ का नेतृत्व किया और राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश करने वाले थे, हालांकि एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की सीमाओं पर बीएनएस की धारा 163 लागू कर दी गई है.

सोनम वांगचुक ने अपनी हीरासत की खबर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी साझा की. वांगचुक ने पोस्ट में लिखा, “मुझे हिरासत में लिया जा रहा है…
150 पदयात्रियों के साथ दिल्ली सीमा पर, 100 पुलिस बल द्वारा, कुछ लोग 1,000 कहते हैं. 80 वर्ष से अधिक उम्र के कई बुजुर्ग पुरूष और महिलाएं और कुछ दर्जन सेना के दिग्गज… हमारा भाग्य अज्ञात है. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, लोकतंत्र की जननी, बापू की समाधि तक सबसे शांतिपूर्ण मार्च पर थे… हाय राम!”

 

दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने ट्वीट किया, “मैं आज दोपहर 1 बजे सोनम वांगचुक से मिलने बवाना पुलिस स्टेशन जाऊंगी. सोनम वांगचुक और हमारे 150 लद्दाखी भाई-बहन शांतिपूर्वक दिल्ली आ रहे थे. पुलिस ने उन्हें रोक लिया है. कल रात से ही उन्हें बवाना पुलिस स्टेशन में कैद करके रखा गया है.”

आखिर सड़को पर क्यों उतरे हैं लद्दाखी?

 

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अगल केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया था. जम्मू-कश्मीर से अलग पहचान होने का उत्साह खत्म होने के तुरंत बाद, लद्दाखी लोगों को एहसास हुआ कि केंद्र शासित प्रदेश के निर्माण ने उन्हें विधायिका के बिना छोड़ दिया, जिससे वह शासन में स्वायत्ता से वंचित हो गए. सराकरी नौकरी और भूमि अधिकारों और भूमि अधिकारों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की भी चिंताएं हैं. इसके अलावा, कारगिल, जो मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम है, बौद्ध बहुल लेह के साथ मिल जाने से नाखुश था.

 

अब पांच साल बाद लद्दाख के लोग सड़कों पर उतर कर पूर्वोत्तर राज्यों के समान, संविधान की छठी अनुसूची के तहत लद्दाख को राज्य का दर्जा और आदिवासी दर्जे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं.

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