ट्रंप का ईरान को आखिरी अल्टीमेटम? NewsMobile EIC सौरभ शुक्ला ने बताया क्यों अगले 48 घंटे हैं बेहद अहम

Washington DC: ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हालात बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गए हैं। इस बीच NewsMobile के एडिटर-इन-चीफ सौरभ शुक्ला ने वॉशिंगटन से स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा कि आने वाले 48 घंटे पूरे क्षेत्र और वैश्विक बाजारों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
सौरभ शुक्ला ने बताया कि व्हाइट हाउस से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को परमाणु कार्यक्रम पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक तरह की “अंतिम समय सीमा” दी है। हालांकि इसके साथ ही पर्दे के पीछे बातचीत और कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं ताकि किसी बड़े सैन्य टकराव को रोका जा सके।
सौरभ शुक्ला: बातचीत जारी, लेकिन दबाव भी बरकरार
शुक्ला के अनुसार, अमेरिका फिलहाल दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है एक तरफ बातचीत और दूसरी तरफ सैन्य विकल्प को खुला रखना।
उन्होंने कहा कि अमेरिकी नेतृत्व का संदेश स्पष्ट है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
UAE और कतर की पहल से टला संभावित सैन्य कदम
सौरभ शुक्ला ने बताया कि सूत्रों के मुताबिक इस सप्ताह संभावित सैन्य कार्रवाई पर विचार हुआ था, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों की मध्यस्थता के बाद बातचीत को एक और मौका दिया गया।
हालांकि क्षेत्र में तनाव अभी भी बना हुआ है और किसी स्थायी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट, तेल बाजार पर असर
अपने विश्लेषण में सौरभ शुक्ला ने कहा कि मौजूदा संकट केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
उन्होंने चेतावनी दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक तेल आपूर्ति और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर बड़ा असर डाल सकता है।
भारत भी रख रहा नजर
सौरभ शुक्ला के अनुसार, भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और संभावित वैश्विक आर्थिक असर को लेकर सतर्क हैं।
उन्होंने कहा कि यदि समझौता नहीं होता है तो तेल बाजारों में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रह सकती है।
अगले 48 घंटे क्यों महत्वपूर्ण?
सौरभ शुक्ला का मानना है कि आने वाले 48 घंटे तय करेंगे कि मामला कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा या क्षेत्र एक नए सैन्य संकट की ओर जाएगा।
उन्होंने कहा कि समझौता होने की स्थिति में भी वैश्विक ऊर्जा बाजार को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं।





