जानें क्या है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल जिसे लेकर विपक्ष और सरकार है आमने-सामने, क्या है इसके फायदे और नुकसान?
केंद्र की सत्ता में 10 साल से काबिज भाजपा सरकार ने वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। देश में इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए इसी महीने की 13 तारीख को लोकसभा में ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल पेश किया है। इस बिल को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पेश किया था।
संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 को ‘ एक देश, एक चुनाव’ के नाम से जाना जाता है। लोकसभा के पटल पर रखे गए इस विधेयक में अनुच्छेद 82 (ए) (लोकसभा और देश की सभी विधानसभाओं के लिए एक साथ इलेक्शन) को जोड़ने और अनुच्छेद 83 संसद के सदनों की अवधि, अनुच्छेद 172 और 327 देश की विधानसभाओं के चुनाव के संबंध में प्रावधान करने की संसद की शक्ति में संशोधन करने का विचार किया गया है।
13 दिसंबर को लोकसभा में पटल पर रखे गए विधेयक में यह भी जानकारी दी गई है कि लोकसभा का कार्यकाल 5 सालों के लिए होगा और नियत तिथि के बाद निर्वाचित देश की सभी विधानसभाओं की अवधि लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही समाप्त होगी।
साल 1951 और 52 में एक साथ हुए थे देशभर में आम चुनाव
गौरतलब है कि भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। संविधान लागू होने के बाद साल 1951 और 1952 में देश के भीतर एक साथ चुनाव हुए थे। साल 1952 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ संपन्न हुए थे। उस दौर के नीतिज्ञ और राजनेता शायद इस बात से परिचित थे कि देश में एक साथ चुनाव कराने से तमाम संसाधनों के अतिरिक्त समय की भी बचत होती है। मगर साल 1967 आते-आते एक साथ चुनाव करने की प्रक्रिया शिथिल बढ़ गई।
देश के अंदर कहीं लोकसभा चुनाव समय से पहले करा लिए गए तो कहीं विधानसभाओं को भंग करना पड़ा। ऐसी स्थिति में तब से लेकर आज तक देश के किसी न किसी हिस्से में हर समय चुनाव होते रहते हैं। जिम समय के साथ देश के संसाधनों की भी क्षति होती है। जो देश के आर्थिक विकास में भी बाधक है। इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
‘ एक देश, एक चुनाव’ पर आम सहमति बनाने के लिए हुई थी ऑल पार्टी मीटिंग
केंद्र की भाजपा सरकार ने देश के भीतर वन नेशन वन इलेक्शन पर सहमति बनाने के लिए साल 2019 में आल पार्टी मीटिंग भी बुलाई थी। हालांकि, सभी दलों के साथ मीटिंग में भी ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर सहमति नहीं बनी थी। इसके बाद साल 2024 में लोकसभा के चुनाव होने से पूर्व हुई 2023 के सितंबर माह में देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। इस कमेटी में देश के गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी, देश के जाने-माने वकील हरीश साल्वे, गुलाम नबी आजाद के अतिरिक्त कई वरिष्ठ अधिकारी भी थे।
‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर जहां सत्ता पक्ष और उसकी सहयोगी पार्टियां इसकी खूबियां गिनाते हैं तो वहीं विपक्ष की प्रमुख पार्टी कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य विपक्षी पार्टियों इस कानून की खामियां गिनाती हैं। ऐसे में साफतौर पर माना जा सकता है कि ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं।
मार्च 2024 में कोविंद कमेटी ने राष्ट्रपति को सौंपी है रिपोर्ट
देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनाई गई कोविंद कमेटी ने साल 2024 के मार्च महीने में ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी है। 18,626 पन्नों की इस रिपोर्ट को केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में मंजूरी दी है।
बिल को पारित करने के लिए करना होगा संविधान संशोधन
‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ को पास करने के लिए सरकार को संविधान संशोधन करना पड़ेगा। वह नेशन वन इलेक्शन सामान्य बहुमत के साथ पारित नहीं हो सकता है। ऐसे में केंद्र सरकार चाहती है कि इस बिल को जेपीसी के पास भेजा जाए। ऐसे में इस बिल पर सब की सहमति बनाई जाए और बिल को पास कराने में उसे परेशानियों का सामना न करना पड़े।
एक राष्ट्र एक चुनाव विधेयक की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि अगर संसद में यह विधेयक पास हो जाए और कानून भी बन जाए तो इसे लागू होने में कम से कम 10 साल लग जाएंगे। इसे कानून बनने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ये हो सकता है कि सरकार को इस विधेयक को संसद में पारित करवाने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा और इसके अलावा, कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से इसे मंजूरी दिलानी होगी। मंजूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून बन सकेगा और लागू हो सकेगा। ऐसे में इसमें काफी वक्त लगेगा।
इतना ही नहीं, इसके एक बार कानून बनने के बाद भी, इसे लागू करने के लिए कई चरणों में काम करना होगा। जैसे चुनाव आयोग को अधिक संख्या में ईवीएम और वीवीपैट की आवश्यकता होगी, जिनके निर्माण और परीक्षण में लंबा समय लगेगा, तो इस तरह से इसे लेकर लंबा इंतजार करना होगा
‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ से होंगे क्या-क्या फायदे?
अगर वन नेशन वन इलेक्शन के फायदे की बात करें तो इस बिल के पास होने के बाद देश में हर समय होने वाले चुनावों में भारी कमी देखने को मिलेगी। जब एक साथ चुनाव होंगे तो समय की बचत होगी। समय की बचत के साथ ही एक साथ चुनाव होने पर आर्थिक व्यय कम होगा। एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 के लोकसभा इलेक्शन में 60 हज़ार करोड रुपए खर्च हुए थे। इसके अलावा चुनाव के दौरान आचार संहिता के समय सरकारी कामकाज ठप हो जाते हैं। जिसका सीधा असर देश के विकास पर पड़ता है। तो इस बिल के लागू होते ही इन सभी समस्याओं से निस्तारण हो जाएगा।
‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ से ये हो सकते हैं नुकसान
वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू होने के बाद अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाने वाले लोकसभा विधानसभा के अतिरिक्त अन्य छोटे इलेक्शंस के मुद्दे अलग-अलग होते हैं। ऐसे में जब ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ की प्रक्रिया लागू होगी तो जनता के मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी इस बात की संभावना काफी कम है। साथ ही ‘ वन नेशन, वन इलेक्शन’ से देश की रीजनल पार्टियों को तगड़ा नुकसान होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि बड़े मुद्दों के शोर में छोटे मुद्दे गायब हो जाएंगे। जिनका सीधा फायदा बड़ी पार्टियों को ही मिलेगा।
buy steroids cycles
References:
cutenite.com
hgh hormon kaufen
References:
https://bleezlabs.com/