ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर: समझें इसके लक्षण, मिथक और हकीकत

ऑटिज्म या ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जो व्यक्ति के सोचने, समझने, बातचीत करने और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती है। इसे “स्पेक्ट्रम” कहा जाता है क्योंकि हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर इसके संकेत बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि दुनिया को समझने का एक अलग तरीका है।
ऑटिज्म को लेकर समाज में कई गलतफहमियां फैली हुई हैं, जिससे लोगों में डर और भ्रम पैदा होता है। मुंबई के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकुश अजीत गुप्ता ने इन मिथकों पर रोशनी डालते हुए सच्चाई बताई है।
मिथक 1: ऑटिज्म से पीड़ित लोग भावनाएं नहीं समझते
सच्चाई: ऐसा नहीं है। ऑटिज्म से जुड़े लोग भावनाएं महसूस करते हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने या दूसरों की भावनाएं समझने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। कई बार यही बात गलत तरीके से समझ ली जाती है।
मिथक 2: ऑटिज्म सिर्फ बच्चों में होता है
सच्चाई: ऑटिज्म जीवनभर रहने वाली स्थिति है। इसके लक्षण बचपन में शुरू होते हैं, लेकिन बड़े होने पर भी रहते हैं। कई लोगों को इसका पता देर से चलता है।
मिथक 3: ऑटिज्म वाले लोग बात नहीं कर सकते
सच्चाई: हर व्यक्ति अलग होता है। कुछ लोग बोल नहीं पाते, जबकि कुछ की भाषा बहुत अच्छी होती है। कई लोग इशारों, साइन लैंग्वेज या अन्य तरीकों से भी अपनी बात अच्छे से रखते हैं।
मिथक 4: वैक्सीन से होता है ऑटिज्म
सच्चाई: यह पूरी तरह गलत है। कई शोधों में साबित हो चुका है कि वैक्सीन और ऑटिज्म का कोई संबंध नहीं है। वैक्सीन गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद करती है।
मिथक 5: ऑटिज्म वाले लोग सफल या आत्मनिर्भर नहीं बन सकते
सच्चाई: सही सपोर्ट और ट्रेनिंग मिलने पर ऑटिज्म से जुड़े लोग पढ़ाई कर सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं और एक अच्छा जीवन जी सकते हैं।
मिथक 6: ऑटिज्म का इलाज संभव है
सच्चाई: ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं है, इसलिए इसका “इलाज” नहीं है। लेकिन थेरेपी और सही मार्गदर्शन से व्यक्ति की जिंदगी बेहतर बनाई जा सकती है।
निष्कर्ष:
ऑटिज्म को समझने के लिए जरूरी है कि हम मिथकों को छोड़कर सच्चाई को अपनाएं। जागरूकता, समझ और सहयोग के साथ ऑटिज्म से जुड़े लोग भी एक खुशहाल और सफल जीवन जी सकते हैं।





