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US-Iran Deal पर EIC Saurabh Shukla का विश्लेषण: ‘यह शांति की ओर पहला कदम, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी’

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया समझौते को लेकर दुनिया भर में चर्चा तेज है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच हुए इस समझौते को कई विशेषज्ञ शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। हालांकि इसके दीर्घकालिक परिणामों को लेकर अभी भी सवाल बने हुए हैं।

NewsMobile EIC सौरभ शुक्ला का मानना है कि यह समझौता फिलहाल तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक पहल है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष अपने वादों और समझौतों का कितना ईमानदारी से पालन करते हैं।

इज़राइल की सहमति के बिना संभव नहीं थी डील

सौरभ शुक्ला के अनुसार, यह मानना गलत होगा कि अमेरिका ने इज़राइल की इच्छा के खिलाफ जाकर यह समझौता किया है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और इज़राइल के बीच मजबूत रणनीतिक तालमेल है और इस समझौते में इज़राइल की सहमति भी शामिल थी। अगर इज़राइल पूरी तरह असहमत होता तो यह समझौता सार्वजनिक रूप से सामने ही नहीं आता।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में इज़राइल को ऐसे सबूत मिलते हैं कि ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं कर रहा है, तो उसकी रणनीति बदल सकती है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत

सौरभ शुक्ला ने इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि Strait of Hormuz में सामान्य गतिविधियों की बहाली को बताया।

उनके मुताबिक, तेल टैंकरों और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही फिर शुरू होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत की खबर है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत समेत एशियाई देशों को होगा, जो ऊर्जा आयात के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं।

ट्रंप पर राजनीतिक दबाव वाली थ्योरी सही नहीं

अमेरिकी राजनीति को करीब से देखने वाले सौरभ शुक्ला का कहना है कि यह कहना सही नहीं होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किसी राजनीतिक दबाव में आकर यह समझौता किया है।

उन्होंने कहा कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ट्रंप का प्रभाव अभी भी मजबूत है और उनके विरोधी उम्मीदवार हाल के चुनावों में खास प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। ऐसे में इस समझौते को केवल घरेलू राजनीति के नजरिए से देखना उचित नहीं होगा।

ईरान भी समझौते के लिए तैयार था

सौरभ शुक्ला का मानना है कि ईरान के भीतर भी समझौते को लेकर व्यापक सहमति थी।

हालांकि कट्टरपंथी गुट अब भी परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख रखते हैं, लेकिन आर्थिक और क्षेत्रीय दबावों को देखते हुए ईरान में भी बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी प्रकार के समझौते के पक्ष में थे।

न्यूक्लियर मुद्दा अभी भी सबसे बड़ी चुनौती

विश्लेषण के दौरान सौरभ शुक्ला ने कहा कि समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान का परमाणु कार्यक्रम रहेगा।

उनके अनुसार, दुनिया इस बात पर नजर रखेगी कि भविष्य में होने वाली वार्ताओं में यूरेनियम संवर्धन और परमाणु गतिविधियों को लेकर क्या शर्तें तय होती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि किसी अस्थिर या आक्रामक शासन के पास परमाणु क्षमता बढ़ती है तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

इज़राइल का सख्त संदेश जारी रहेगा

सौरभ शुक्ला का मानना है कि समझौते के बावजूद इज़राइल अपनी सुरक्षा नीति में नरमी नहीं लाएगा।

इज़राइल यह स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि यदि ईरान समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो उसके पास जवाबी कार्रवाई के विकल्प मौजूद हैं।

यानी कूटनीति के साथ-साथ सुरक्षा का दबाव भी बना रहेगा।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है।

ऐसे में होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुला रहना, तेल आपूर्ति का सामान्य होना और क्षेत्र में स्थिरता भारत के आर्थिक हितों के लिए बेहद अहम है।

साथ ही यह समझौता वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित रखने में भी मदद कर सकता है, जिसका सीधा फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को मिल सकता है।

पहला कदम सकारात्मक, लेकिन रास्ता लंबा

सौरभ शुक्ला का मानना है कि इस समझौते को अंतिम समाधान नहीं बल्कि एक शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार, “यह आशावाद की दिशा में उठाया गया एक कदम है। अभी कई चुनौतियां बाकी हैं, लेकिन कम से कम संवाद की प्रक्रिया फिर शुरू हुई है।”

फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और इज़राइल इस समझौते को किस तरह आगे बढ़ाते हैं और क्या यह वास्तव में पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का आधार बन पाता है।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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