अमेरिका-ईरान वार्ता पर संकट, EIC सौरभ शुक्ला ने बताया क्यों बढ़ रहा है तनाव

Washington DC: अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर-इन-चीफ सौरभ शुक्ला ने चेतावनी दी है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े तत्वों द्वारा अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
वॉशिंगटन डीसी से बातचीत के दौरान सौरभ शुक्ला ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच एक संभावित समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। प्रस्तावित ढांचे के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करेगा, समृद्ध यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में सौंपेगा और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगों को हटाने की अनुमति देगा। इसके बदले अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत देने के साथ पुनर्निर्माण सहायता प्रदान कर सकते हैं।
हालांकि, शुक्ला के अनुसार IRGC के कट्टरपंथी कमांडर इस प्रस्तावित समझौते का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह समझौता ईरान के साथ अन्यायपूर्ण है और इससे देश की रणनीतिक एवं परमाणु क्षमताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
ईरान के भीतर बढ़ रहा मतभेद
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के कई मध्यमार्गी नेता समझौते के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि लंबे समय से जारी आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के कारण देश को राहत की आवश्यकता है। लेकिन दूसरी ओर IRGC से जुड़े कठोर रुख वाले गुट सैन्य और रणनीतिक निर्णयों में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कट्टरपंथी गुटों का दबदबा बढ़ता है तो अमेरिका और ईरान के बीच किसी स्थायी समझौते की संभावना कमजोर पड़ सकती है।
सीजफायर विस्तार पर भी खतरा
सौरभ शुक्ला ने कहा कि हालिया हमलों ने दोनों देशों के बीच चल रही वार्ता को गंभीर झटका पहुंचाया है। इससे न केवल 60 दिनों के लिए प्रस्तावित सीजफायर विस्तार प्रभावित हो सकता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को ईरान के परमाणु सामग्री तक पहुंच दिलाने की कोशिशें भी बाधित हो सकती हैं।
उन्होंने बताया कि अमेरिका पहले ही संकेत दे चुका था कि सैन्य संघर्ष का चरण लगभग समाप्त हो चुका है और अब समाधान कूटनीतिक माध्यमों से खोजा जाना चाहिए। लेकिन यदि अमेरिकी सैन्य ठिकानों या संपत्तियों पर हमले जारी रहते हैं तो वॉशिंगटन के पास जवाबी कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संघर्ष अपने अंतिम चरण में दिखाई दे रहा है, लेकिन यदि तनाव फिर बढ़ता है तो इसके गंभीर वैश्विक परिणाम हो सकते हैं। खासतौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य का दोबारा खुलना टल सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति प्रभावित होगी।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। किसी भी प्रकार का व्यवधान तेल कीमतों में तेजी ला सकता है और भारत सहित एशियाई देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाल सकता है।
क्या होगा आगे?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह अमेरिका-ईरान संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखते हैं और कट्टरपंथी तत्वों को नियंत्रित करने में सफल रहते हैं, तो क्षेत्र में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि हमले जारी रहे तो मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें वॉशिंगटन और तेहरान के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।





