ग्रेजुएट होने के बाद भी बेरोजगारी क्यों? चौंकाने वाली सच्चाई

भारत में शिक्षा का विस्तार तेजी से हुआ है और हर वर्ष लाखों युवा ग्रेजुएट बनकर निकल रहे हैं, लेकिन रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पाए हैं। इसी कारण देश में ग्रेजुएट बेरोजगारी एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती के रूप में उभर रही है। हालिया अध्ययन, विशेष रूप से Azim Premji University की “State of Working India 2026” रिपोर्ट, इस समस्या की गहराई को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। रिपोर्ट के अनुसार युवा ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी की स्थिति चिंताजनक है और यह भारत की श्रम बाजार संरचना में मौजूद असंतुलन को दर्शाती है।
भारत में ग्रेजुएट बेरोजगारी की स्थिति
भारत में शिक्षित युवाओं के बीच बेरोजगारी का स्तर कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग में ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी की दर उल्लेखनीय रूप से ऊंची बनी हुई है। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार पाने में असमर्थ हैं या उन्हें अपनी योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति केवल बेरोजगारी तक सीमित नहीं है, बल्कि अंडर-एम्प्लॉयमेंट यानी कम योग्यता वाले काम करने की प्रवृत्ति को भी बढ़ाती है।
वैश्विक संदर्भ में तुलना
यदि भारत की स्थिति को अन्य देशों के संदर्भ में देखा जाए तो अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरण के लिए United States में हाल के वर्षों में ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी अपेक्षाकृत कम स्तर पर रही है, जबकि China में भी युवा बेरोजगारी को लेकर चुनौतियाँ सामने आई हैं, लेकिन वहां की दर भारत से कम मानी जाती है। इसी तरह European Union के कुछ देशों में बेरोजगारी अधिक है, जबकि जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों में रोजगार की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। इन तुलनाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारत में समस्या अधिक व्यापक और संरचनात्मक है।
शिक्षा और रोजगार के बीच असंतुलन
भारत में ग्रेजुएट बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच का अंतर है। विश्वविद्यालयों से निकलने वाले अधिकांश छात्र ऐसे कौशल लेकर आते हैं जो सीधे उद्योग की मांगों से मेल नहीं खाते। परिणामस्वरूप कंपनियों को प्रशिक्षित और तैयार उम्मीदवारों की कमी का सामना करना पड़ता है, जबकि युवाओं को रोजगार पाने में कठिनाई होती है। यह स्किल गैप लंबे समय से मौजूद है और समय के साथ और स्पष्ट होता जा रहा है।
रोजगार सृजन की धीमी गति
देश में आर्थिक विकास के बावजूद रोजगार सृजन अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाया है। कई क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ी है, लेकिन उसका प्रभाव रोजगार के अवसरों पर सीमित रहा है। इसके अलावा तकनीकी बदलाव और ऑटोमेशन ने भी कुछ पारंपरिक नौकरियों को कम किया है, जिससे नई नौकरियों का सृजन और भी आवश्यक हो गया है।
भारत में ग्रेजुएट बेरोजगारी केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह शिक्षा प्रणाली, कौशल विकास और रोजगार नीति से जुड़ी एक व्यापक संरचनात्मक चुनौती है। Azim Premji University की रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि यदि शिक्षा और रोजगार के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए और युवाओं को ऐसे कौशल प्रदान किए जाएं जो उन्हें रोजगार के लिए अधिक सक्षम बना सकें।





