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Lohri Special 2026: अग्नि की परिक्रमा, अन्न की आस और धुल्ला भट्टी की शौर्यकथा

दिल्ली. जनवरी की ठिठुरती सर्दी में जब खेतों में गेहूं की फसलें लहलहाने लगती हैं, तब उत्तर भारत के गांवों में अलाव की लपटें आसमान को छूने लगती हैं. लोहड़ी का यह पावन पर्व किसानों के लिए महज एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने और नई फसल के स्वागत का माध्यम है.

खेतों से उठती उम्मीदों का जश्न

पंजाब, हरियाणा और आसपास के प्रदेशों में लोहड़ी का त्योहार कृषि चक्र के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है. रबी की बुवाई के बाद जब फसलें पकने की ओर अग्रसर होती हैं, तब किसान अपनी मेहनत के फल की आस में इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं. सूर्य देव की उपासना और अग्नि की पूजा के माध्यम से वे अनुकूल मौसम और अच्छी पैदावार की कामना करते हैं.

अलाव में डाले जाने वाले तिल, गुड़, मूंगफली और मक्के केवल प्रसाद नहीं हैं, बल्कि ये धरती माता को उनकी उदारता के लिए धन्यवाद देने का प्रतीक हैं. गांवों में सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला यह उत्सव एकता और भाईचारे की भावना को भी सशक्त करता है.

वीर धुल्ला भट्टी: लोककथाओं का अमर नायक

लोहड़ी की रौनक में रंग भरने वाली एक खास परंपरा है – धुल्ला भट्टी के गीत. बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी “सुंदर मुंदरिए” गाते हुए घर-घर घूमते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह गीत किसकी याद में गाया जाता है?

16वीं शताब्दी के मुगल दौर में धुल्ला भट्टी एक ऐसे लोकनायक थे, जिन्हें पंजाब का रॉबिन हुड माना जाता है. अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई और गरीबों के प्रति उनकी करुणा ने उन्हें अमर बना दिया. जनश्रुतियों के अनुसार, उन्होंने उन असहाय लड़कियों की रक्षा की जिन्हें जबरन बेचा जाता था.

सबसे प्रसिद्ध कथा सुंदरी और मुंदरी नाम की दो अनाथ बहनों से जुड़ी है. धुल्ला भट्टी ने इन लड़कियों को दासता से बचाया और पिता की भूमिका निभाते हुए उनका विवाह संपन्न कराया. उन्होंने अपनी जेब से शक्कर भी दी, जो उस समय बेहद कीमती थी. यही कारण है कि लोहड़ी के गीत में कहा जाता है:

सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो?
धुल्ला भट्टी वाला हो…”

परंपरा में जीवित है न्याय का संदेश

आज भी जब बच्चे घर-घर जाकर यह गीत गाते हैं और लोग उन्हें रेवड़ी, गजक और मूंगफली देते हैं, तो यह केवल एक रस्म नहीं है. यह धुल्ला भट्टी के साहस, न्याय और मानवता की याद में एक श्रद्धांजलि है.

लोहड़ी का यह पहलू त्योहार को विशेष महत्व देता है – यह सिखाता है कि उत्सव केवल खुशियां मनाने के लिए नहीं, बल्कि उन मूल्यों को जीवित रखने के लिए भी होते हैं जो समाज को मजबूत बनाते हैं.

आधुनिक युग में लोहड़ी का संदेश

जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच आज का किसान कई चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में लोहड़ी की अग्नि केवल शीत को दूर करने का साधन नहीं, बल्कि किसानों के हौसले को बुलंद करने का माध्यम भी है. यह त्योहार याद दिलाता है कि कठिन परिश्रम के बाद खुशहाली अवश्य आती है.

धुल्ला भट्टी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि समाज में कमजोरों की रक्षा और न्याय के लिए खड़ा होना हर युग में प्रासंगिक है. लोहड़ी इस प्रकार केवल फसल का उत्सव नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक एकता का भी पर्व है.

जैसे-जैसे अलाव की लपटें ऊंची उठती हैं, वे हमें याद दिलाती हैं कि देश की समृद्धि की असली नींव खेतों में है और किसानों की खुशहाली में ही देश का भविष्य निहित है.

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