भारतीय सेना में नया इतिहास: सई जाधव बनीं आईएमए से पास आउट होने वाली पहली महिला अधिकारी

भारतीय सेना के इतिहास में एक ऐतिहासिक पल जुड़ गया है। 23 वर्षीय सई जाधव ने भारतीय मिलिट्री अकादमी (आईएमए) से पास आउट होकर इतिहास रच दिया है। 93 साल पुरानी इस प्रतिष्ठित अकादमी से अब तक 67 हजार से ज्यादा कैडेट निकल चुके हैं, लेकिन पहली बार किसी महिला ने यहां से ट्रेनिंग पूरी की है। सई जाधव की यह उपलब्धि न सिर्फ व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि सेना में बदलते दौर की मजबूत तस्वीर भी पेश करती है।
सई जाधव को टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला है। इससे पहले महिलाएं टेरिटोरियल आर्मी का हिस्सा रही हैं, लेकिन किसी महिला ने आईएमए से ट्रेनिंग लेकर यह मुकाम हासिल नहीं किया था। यही वजह है कि सई की सफलता को ऐतिहासिक माना जा रहा है।
सई जाधव एक सैन्य परिवार से आती हैं। वह जाधव परिवार की चौथी पीढ़ी हैं, जिन्होंने देश की सेवा का रास्ता चुना। उनके परदादा ब्रिटिश आर्मी में थे, दादा भारतीय सेना में सेवा कर चुके हैं और उनके पिता संदीप जाधव आज भी भारतीय सेना में कार्यरत हैं।
पास आउट परेड के दौरान एक भावुक पल भी देखने को मिला, जब सई के माता-पिता ने उनके कंधों पर स्टार लगाए। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और लोग इसे गर्व व प्रेरणा का क्षण बता रहे हैं।
सई बताती हैं कि उनका सफर आसान नहीं था। उन्हें विशेष अनुमति के जरिए आईएमए में प्रवेश मिला और छह महीने की कठिन ट्रेनिंग पूरी करनी पड़ी। ट्रेनिंग के दौरान ड्रिल, अनुशासन और उम्मीदें सभी के लिए समान थीं। सई ने हर चुनौती को पार करते हुए खुद को साबित किया।
पिता की पोस्टिंग के कारण सई की पढ़ाई अलग-अलग शहरों में हुई। उनकी शुरुआती शिक्षा बेलगाम से शुरू हुई और फिर उन्होंने कई राज्यों में पढ़ाई की। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा पास की और सर्विस सिलेक्शन बोर्ड तक पहुंचीं, जहां उनके प्रदर्शन ने आईएमए का रास्ता खोला।
फिलहाल भारतीय सेना में एनडीए की पहली महिला बैच की आठ कैडेट ट्रेनिंग ले रही हैं। सई जाधव का कमीशन यह दिखाता है कि सेना में बदलाव धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से आगे बढ़ रहा है। जून 2026 में सई एक बार फिर इतिहास का हिस्सा बनेंगी, जब वह आईएमए के परेड ग्राउंड में चेतवोड बिल्डिंग के सामने मार्च करेंगी। यह पल सिर्फ एक परंपरा नहीं होगा, बल्कि इस बात का सबूत होगा कि समय के साथ परंपराएं भी बदल सकती हैं।





