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रेड फोर्ट ब्लास्ट केस में अल-फलाह यूनिवर्सिटी के फाउंडर जावेद सिद्दीकी जांच के घेरे में

दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार ब्लास्ट मामले की जांच गुरुवार को और आगे बढ़ गई है। जांच एजेंसियों ने अब फरिदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी के संस्थापक और ट्रस्टी जावेद अहमद सिद्दीकी को जांच के दायरे में शामिल किया है। जानकारी के अनुसार, इस यूनिवर्सिटी में दो मुख्य आरोपियों — डॉ. शाहीन सईद और डॉ. मुजम्मिल शकील — को नौकरी दी गई थी। यही कारण है कि अब जांच एजेंसियां यूनिवर्सिटी की गतिविधियों और इसके फंडिंग स्रोतों की भी गहराई से पड़ताल कर रही हैं।

गौरतलब है कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के दायरे में है, जो इसके फंड के स्रोतों और खर्चों की जांच कर रहा है। जांच एजेंसियां अब सिद्दीकी के पुराने आपराधिक मामलों की भी जांच कर रही हैं। बताया गया है कि उन पर और उनके एक सहयोगी पर करीब 7.5 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप था। इस मामले में दोनों को तीन साल की जेल भी हुई थी।

यूनिवर्सिटी के लीगल एडवाइजर मोहम्मद रज़ी ने हालांकि सभी आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि “सिद्दीकी के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोप झूठे हैं” और उन्हें डॉ. शकील की भर्ती के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। रज़ी के मुताबिक, भर्ती का काम वाइस-चांसलर की ज़िम्मेदारी है। मध्य प्रदेश के महू में जन्मे जावेद सिद्दीकी 9 कंपनियों के बोर्ड मेंबर हैं। ये सभी कंपनियां अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़ी हुई हैं, जो यूनिवर्सिटी का संचालन भी करती है।

इन कंपनियों में शिक्षा, सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाओं और ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। शुरुआती जांच में यह सामने आया है कि इन सभी कंपनियों का पंजीकृत पता एक ही है — ओखला के जामिया नगर स्थित अल-फलाह हाउस। 2019 के बाद इनमें से ज़्यादातर कंपनियां बंद हो गईं या निष्क्रिय हो गईं। हालांकि, अल-फलाह मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन लगातार सक्रिय रहा और यह 1997 में एक इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में शुरू हुआ था। अब यह 78 एकड़ में फैले कैंपस के साथ यूनिवर्सिटी के रूप में कार्यरत है, लेकिन अब NAAC की जांच के अधीन है।

सिद्दीकी पर जो पुराना मामला फिर सुर्खियों में आया है, वह दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप था कि सिद्दीकी और उनके सहयोगियों ने फर्जी निवेश योजनाएं चलाकर लोगों से पैसे जमा करवाए और बाद में उन पैसों को अपने निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया। जांच में सामने आया कि उन्होंने निवेशकों को भरोसा दिलाया कि उनका पैसा शेयर में बदला गया है, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट में पता चला कि शेयर सर्टिफिकेट्स पर जाली हस्ताक्षर थे।

सिद्दीकी को 2001 में गिरफ्तार किया गया था। 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बाद में 2004 में उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली कि वे निवेशकों का पैसा लौटाएंगे। जनवरी 2020 में दिल्ली पुलिस ने फिर से ओखला स्थित उनके दफ्तर पर छापेमारी की थी। बताया गया कि उस समय भी उन पर आर्थिक रूप से कमजोर मुस्लिम परिवारों को “हलाल निवेश योजनाओं” के नाम पर ठगने के आरोप लगे थे।

अब जबकि दिल्ली रेड फोर्ट ब्लास्ट केस में सिद्दीकी का नाम सामने आया है, जांच एजेंसियां अल-फलाह ग्रुप और उससे जुड़ी सभी कंपनियों की वित्तीय गतिविधियों की गहन जांच कर रही हैं। इस पूरे मामले ने यूनिवर्सिटी की साख और उसके नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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