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महाकुंभ में हर्षा रिछारिया को लेकर मचा बवाल! जानें क्या है माजरा

प्रयागराज के महाकुंभ में साधु-संतों और सनातन संस्कृति की परंपराओं के बीच इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा तेजी से  चर्चा में आ रहा है—हर्षा रिछारिया। भगवा वस्त्रों में गंगा के तट पर उनकी मौजूदगी ने जहां एक ओर सनातन धर्म के अनुयायियों का ध्यान खींचा, वहीं दूसरी ओर विवादों का तूफान आ खड़ा हुआ है। साध्वी के वेश में कुंभ की सबसे खूबसूरत महिला कहलाई जाने वाली हर्षा का अतीत और उनकी ग्लैमरस छवि ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है।

 

असली साध्वी या दिखावा?

हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने हर्षा की साध्वी वाली छवि पर सवाल खड़े कर दिए है। वीडियो में हर्षा वेस्टर्न ड्रेस में रील बनाती नजर आ रही हैं। एक सीन में पार्लर के भीतर उनकी नकली जटाओं को संवारते हुए दिखाया गया। यह वही जटाएं हैं जो उन्होंने महाकुंभ में आने से पहले लगवाई थीं। इस खुलासे के बाद हर्षा सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रही है।

 

 साध्वी का भगवा वस्त्र और संत समाज का गुस्सा

 हर्षा, मूल रूप से झांसी के मऊरानीपुर कस्बे की रहने वाली हैं। उनका परिवार भोपाल में बस गया, और अब वह उत्तराखंड में रहती हैं। एक समय ग्लैमर और यूट्यूब की दुनिया का हिस्सा रहीं हर्षा ने महाकुंभ में निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि से दीक्षा लेकर सनातन धर्म अपनाने का दावा किया। मकर संक्रांति के दिन उन्होंने अखाड़े के साथ भगवा वस्त्र पहनकर अमृत स्नान किया।

 

साध्वी का भगवा वस्त्र और संत समाज का गुस्सा

हर्षा का साध्वी वेश धारण करना और शाही रथ पर सवार होकर स्नान करना कई संतों को रास नहीं आया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे सनातन धर्म की परंपराओं का अपमान बताया। उन्होंने कहा, “जिस महिला की शादी अगले महीने होने वाली हो, उसे भगवा वस्त्र पहनाकर साध्वी की तरह प्रस्तुत करना त्याग की परंपरा का अपमान है।”

 

विवाद बढ़ा, कुंभ छोड़ने का किया ऐलान

सोशल मीडिया और संत समाज के विरोध के चलते हर्षा ने कुंभ नगरी छोड़ने का ऐलान क्या है। एक वीडियो में उन्होंने रोते हुए कहा, “मैं यहां सनातन धर्म को करीब से समझने आई थी, लेकिन अपने गुरु का अपमान नहीं देख सकती।” हालांकि, विवादों के बावजूद वह कुंभ के सेक्टर 11 में घूमती और गंगा दर्शन करती नजर आई।

 

संत समाज में फूट, हर्षा बनीं विवाद की केंद्रबिंदु

इस पूरे प्रकरण ने संत समाज को भी दो हिस्सों में बांट दिया। एक ओर स्वामी आनंद स्वरूप ने निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि को पद से हटाने की मांग की, तो दूसरी ओर कैलाशानंद ने इस विवाद को गैरजरूरी बताया। उन्होंने कहा, “हर्षा ने कोई गलत काम नहीं किया। वह साध्वी नहीं हैं, बस एक अनुयायी हैं।”

 

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