तारिक रहमान की 17 साल बाद बांग्लादेश में वापसी, भारत के लिए अहम मोड़!

ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान गुरुवार, 25 दिसंबर को 17 साल के वनवास के बाद अपने देश लौट आए हैं. लंदन में लंबे समय तक निर्वासन की जिंदगी गुजारने के बाद उनकी वापसी से BNP नेताओं और कार्यकर्ताओं का लंबा इंतजार खत्म हुआ है.
बीमार पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के 60 वर्षीय बेटे रहमान फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं. यह हिंसा प्रभावित बांग्लादेश के लिए निर्णायक क्षण माना जा रहा है, जो महत्वपूर्ण चुनाव से ठीक पहले आया है.
भारत के लिए संवेदनशील मौका
रहमान की वापसी न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति के लिए बल्कि भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है. दिल्ली उनकी वापसी पर करीबी नजर रख रही है, खासकर उस समय जब भारत समर्थक अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है, शेख हसीना भारत में शरण लेने को मजबूर हैं और BNP की सुप्रीमो जिया खुद अस्पताल में भर्ती हैं.
जमात-ए-इस्लामी की चुनौती
इस समय बांग्लादेश एक चौराहे पर खड़ा है. वहां कट्टरपंथी तत्व बेलगाम हो रहे हैं और अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में भारत विरोधी नफरत फैला रहे हैं. भारत की खास चिंता जमात-ए-इस्लामी को लेकर है, जिसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की कठपुतली माना जाता है.
जमात पूरी तैयारी में है कि वो इस चुनाव में बाजी मार ले और बांग्लादेश में अपनी सरकार बना ले. उसने अपने नेतृत्व में 8 इस्लामी पार्टियों का गठबंधन भी बनाया है और सीटों का बंटवारा भी लगभग तय कर लिया है.
BNP को अधिक उदार विकल्प के रूप में देख रहा भारत
परिस्थिति ऐसी है कि भले BNP का ऐतिहासिक रूप से दिल्ली के साथ तनावपूर्ण संबंध रहा हो, मौजूदा वक्त में BNP को ही भारत अधिक उदार और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देख रहा है. अवामी लीग का पत्ता पहले ही काटा जा चुका है और ऐसे में नई दिल्ली को उम्मीद होगी कि रहमान की वापसी से BNP कार्यकर्ताओं में जोश आएगा और पार्टी अगली सरकार बनाएगी.
पाकिस्तान के बढ़ते कदम
शेख हसीना ने पाकिस्तान से सुरक्षित दूरी बनाए रखी थी लेकिन उनके तख्तापलट के बाद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश ने यू-टर्न ले लिया है. जिस भारत ने आजादी दिलाई, उसी से दूर होकर आज बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंधों पर जोर दिया है. जमात की सरकार आने पर यह साठगांठ और मजबूत होने का डर है.





