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चाय बागान से राष्ट्रपति भवन तक का सफर: जानिए कैसे इस शिक्षक ने लिखी प्रेरणा की कहानी!

शिक्षक दिवस के मौके पर असम के देबजीत घोष की कहानी पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है। आज उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान उनकी मेहनत, समर्पण और उस बदलाव का नतीजा है जो उन्होंने ऊपरी असम के चाय बागान क्षेत्रों में शिक्षा के लिए किया है।

150 किलोमीटर की रोज़ाना यात्रा

देबजीत घोष हर सुबह डिब्रूगढ़ से नामसांग टी गार्डन आदर्श स्कूल तक 150 किलोमीटर की लंबी यात्रा करते हैं। इस सफर में उन्हें दीहिंग पटकाई नेशनल पार्क से गुजरना पड़ता है, जहां हाथियों के हमले का खतरा रहता है। बरसात के दिनों में सड़कें कीचड़ से भर जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद 34 वर्षीय घोष ने कभी हार नहीं मानी। वे कहते हैं, “अगर मैं यहां नहीं रहूंगा तो स्कूल में विकास का काम संभव नहीं होगा। मैं रोज़ डॉक्युमेंट्स ऑफिस भेजता हूं और मेरी पत्नी भी डिब्रूगढ़ में काम करती हैं।”

चाय बागान के बच्चों के लिए उम्मीद की किरण

घोष ने 2013 में डिब्रूगढ़ बंगाली हाई स्कूल में शिक्षक के रूप में करियर की शुरुआत की। उनकी सोच हमेशा रही कि बच्चों को अंकों के बजाय जिज्ञासा से सीखने की आदत डालनी चाहिए। इसी सोच ने उन्हें आगे बढ़ाया।

2022 में उन्होंने नामसांग टी गार्डन आदर्श स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इस स्कूल के खुलने से पहले, चाय बागान के बच्चे अक्सर 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते थे क्योंकि आसपास कोई हाई स्कूल नहीं था। आज यह स्कूल 300 से ज़्यादा बच्चों को फिर से कक्षा में लाने में सफल रहा है। पहले बैच में 32 में से सिर्फ़ 14 छात्र पास हुए थे, लेकिन अगले साल 20 में से 18 पास हुए और रिज़ल्ट 90% तक पहुंच गया।

नए तरीके से पढ़ाई और स्वास्थ्य पर ध्यान

घोष बच्चों को पढ़ाने के लिए नए तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। वे ‘सीखते हुए करने’ पर ज़ोर देते हैं। बच्चों को प्रैक्टिकल्स, खिलौने बनाने, प्रयोग करने और टेक्नोलॉजी के जरिए पढ़ाते हैं। वर्चुअल लैब, 3D वेबसाइट और ICT टूल्स के ज़रिए वे क्लास को रोचक बनाते हैं। वे कहते हैं, “अगर आप सिर्फ़ लेक्चर देंगे तो बच्चे ध्यान नहीं देंगे। लेकिन जब आप उन्हें इंटरैक्टिव तरीके से पढ़ाते हैं तो वे मज़े से सीखते हैं।”

सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं, घोष ने बच्चों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत उन्होंने हेल्थ कैंप आयोजित किए। जांच में पाया कि अधिकतर बच्चों में हीमोग्लोबिन की कमी थी। घोष ने सुनिश्चित किया कि बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां मिलें। तीन साल में बच्चों का स्वास्थ्य काफी बेहतर हुआ।

ड्रॉपआउट रोकने में बड़ी सफलता

देबजीत घोष ने चाय बागान के उन 267 बच्चों को वापस स्कूल में लाया जो पढ़ाई छोड़ चुके थे। वे माता-पिता से बात करते, उन्हें समझाते और शिक्षा की अहमियत बताते। अब वही बच्चे आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी स्कूल आकर बच्चों को प्रेरित करते हैं।

“शिक्षक ही नहीं, मार्गदर्शक बनना ज़रूरी”

जब उनसे पूछा गया कि वे कैसे याद किए जाना चाहते हैं, तो उन्होंने कहा: “एक ऐसे शिक्षक के रूप में जिसने न सिर्फ़ पढ़ाया बल्कि ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण समय में छात्रों का मार्गदर्शन किया।”

वे नए शिक्षकों को सलाह देते हैं: “सिर्फ़ पढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की हर ज़रूरत को समझने के लिए तैयार रहें। सीखना कभी खत्म नहीं होता।”

आज जब देबजीत घोष राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार लेने जा रहे हैं, उनकी कहानी साबित करती है कि एक शिक्षक की लगन पूरे समाज को बदल सकती है।

 

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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