सुप्रीम कोर्ट की केंद्र सरकार को सख्त हिदायत, ‘डिजिटल अरेस्ट’ को बने अलग अपराध, Deepfake पर भी कानून लाने की मांग
देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, सॉलिसिटर जनरल ने कहा- जल्द आ सकता है नया ड्राफ्ट बिल।

देश में लगातार बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर धोखाधड़ी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि डिजिटल अरेस्ट को एक अलग और गंभीर आपराधिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने बढ़ते डीपफेक (Deepfake) मामलों से निपटने के लिए भी एक स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने की सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान यदि अदालत के सामने पर्याप्त प्रथम दृष्टया (prima facie) सामग्री आती है, तो जांच एजेंसियों को आरोपी की संपत्ति कुर्क करने (freeze) की अनुमति मिलनी चाहिए। जस्टिस बागची ने यह भी रेखांकित किया कि उभरते साइबर खतरों से निपटने के लिए स्पष्ट विधायी समर्थन की जरूरत है।
सरकार ला रही है नया कानून
अदालत के सवालों का जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि केंद्र सरकार इन अपराधों से निपटने के लिए पहले से ही नए कानून की तैयारी कर रही है। मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि एक नया ड्राफ्ट बिल तैयार किया जा रहा है, जो डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसी समस्याओं से सख्ती से निपटेगा।
इसके अलावा, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि एक अंतर-विभागीय समिति साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी कानूनी और प्रक्रियात्मक कमियों को दूर करने के लिए अपनी रिपोर्ट के अंतिम चरण में है। साथ ही, सीबीआई (CBI) देश भर में 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक के नुकसान वाले लगभग 20 बड़े डिजिटल धोखाधड़ी मामलों की जांच कर रही है, जबकि अन्य मामलों को राज्य पुलिस संभाल रही है।





