
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। मंगलवार को INR डॉलर के मुकाबले और कमजोर होकर 96.58 के नए सर्वकालिक निचले स्तर (All-time low) पर बंद हुआ। रुपये की यह लगातार 12वीं गिरावट है, जिसने बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
क्यों गिर रहा है INR?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय मुद्रा एक ‘ट्रिपल-व्हैमी’ (तीन तरफा मार) का सामना कर रही है:
1 कच्चे तेल की कीमतें: मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें खतरनाक स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ रहा है।
2 अमेरिकी फेडरल रिजर्व का रुख: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ‘हायर-फॉर-लॉन्गर’ (ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रखने) की नीति के कारण डॉलर लगातार मजबूत बना हुआ है।
3 विदेशी निवेशकों की निकासी: वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश की तलाश में बाहर जा रहे हैं।
अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, आयात-प्रधान और बिना हेजिंग वाले कॉर्पोरेट सेक्टर को गंभीर मार्जिन दबाव का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को मामूली लाभ मिल सकता है, बशर्ते वैश्विक मांग बनी रहे।
स्वस्तिका इन्वेस्टस्मार्ट के हेड ऑफ रिसर्च, संतोष मीना का कहना है कि हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास विदेशी मुद्रा भंडार है जो अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन यह वैश्विक झटकों से पूरी तरह नहीं बचा सकता। जब तक कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं, तब तक रुपये पर दबाव बना रहने की आशंका है।
यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय का संकेत है, जहां वैश्विक कारकों का सीधा असर घरेलू मुद्रा पर दिख रहा है।





