भारत

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हालत चिंताजनक: भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक क्या है?

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) एक वार्षिक रिपोर्ट है जो यह बताती है कि दुनिया के विभिन्न देशों में पत्रकार, मीडिया हाउस और इंटरनेट यूज़र्स कितनी आज़ादी से अपनी बात कह सकते हैं। इसे रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) नाम की संस्था द्वारा जारी किया जाता है, जिसकी स्थापना 1985 में फ्रांस में हुई थी।

RSF एक स्वतंत्र, गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संगठन है, जिसे यूनेस्को, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपियन काउंसिल जैसे बड़े संगठनों से मान्यता प्राप्त है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

भारत की स्थिति चिंताजनक

2024 में प्रकाशित रिपोर्ट में भारत को 180 देशों में से 159वां स्थान मिला है, जो कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज़ से एक बहुत ही खराब स्थिति मानी जा रही है। पिछले वर्ष भारत 161वें स्थान पर था, यानी भारत की रैंकिंग में दो स्थान की और गिरावट आई है। यह गिरावट इसलिए गंभीर है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और ऐसे देश में प्रेस को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा जाता है। मीडिया का काम न सिर्फ खबरें देना होता है, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा करना, जनता की आवाज़ उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना भी होता है।

मीडिया पर बढ़ता सरकारी दबाव

बीते कुछ वर्षों में यह देखने को मिला है कि सरकार की आलोचना करना मुश्किल होता जा रहा है। जो पत्रकार या मीडिया संस्थान सरकार की आलोचना करते हैं, उन्हें देशविरोधी कहकर बदनाम किया जाता है। मीडिया हाउस पर प्रायोजित (Sponsored) खबरें दिखाने का दबाव डाला जाता है, जिससे पत्रकारों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित होती है। यह एक कारण है कि भारत की रैंकिंग इतनी नीचे चली गई है। प्रेस की आज़ादी लोकतंत्र की रीढ़ है, और जब यह स्वतंत्रता छीनी जाती है, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है

रैंकिंग कैसे तय होती है?

RSF इस सूचकांक को तय करने के लिए दुनिया भर के पत्रकारों, विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से एक प्रश्नावली (Questionnaire) भरवाता है।
इसमें निम्नलिखित 7 मानदंड शामिल होते हैं:

1. बहुलवाद – मीडिया में विभिन्न विचारों की मौजूदगी

2. स्वतंत्रता – सरकार या किसी समूह से मुक्त होकर रिपोर्टिंग की क्षमता

3. कानूनी माहौल – कानून पत्रकारों की मदद करते हैं या रोकते हैं

4. पारदर्शिता – मीडिया और सरकार के बीच पारदर्शिता कितनी है

5. बुनियादी ढांचा – पत्रकारिता के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता

6. आत्म-सेंसरशिप – डर या दबाव में पत्रकार खुद ही खुद पर सेंसर लगाते हैं या नहीं

7. हिंसा और दमन – पत्रकारों पर हमले, धमकी या हत्या की घटनाएं

इन सब मापदंडों के आधार पर देशों की रैंकिंग तय होती है। इस रैंकिंग में कम अंक यानी बेहतर स्थिति को दर्शाता है।

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका की स्थिति भी गंभीर

RSF की रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र के लगभग आधे देशों में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति “बहुत गंभीर” है।
यमन, सऊदी अरब, ईरान, फिलिस्तीन, इराक, सीरिया और मिस्र जैसे देश इस सूची में शामिल हैं।

फिलिस्तीन, जो लगातार इजरायली सेना के हमलों का सामना कर रहा है, पत्रकारों के लिए सबसे घातक देश बन गया है।
इस क्षेत्र में केवल कतर ऐसा देश है जहाँ प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति “बहुत गंभीर” नहीं है।

भारत के पड़ोसी देशों की रैंकिंग

पाकिस्तान को इस बार 152वां स्थान मिला है, जो भारत से थोड़ा ऊपर है।

श्रीलंका 150वें स्थान पर है।

यह दर्शाता है कि दक्षिण एशिया में भी प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

भारत जैसे लोकतंत्र में मीडिया का मुख्य काम है – सत्ता से सवाल करना, जनता की आवाज़ उठाना, और निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना।
लेकिन जब पत्रकारों को डर, दबाव और सेंसरशिप का सामना करना पड़े, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

अगर भारत को एक सशक्त लोकतंत्र बनाना है, तो पत्रकारों और मीडिया संगठनों को स्वतंत्र रूप से काम करने की पूरी आज़ादी दी जानी चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ पत्रकारों का मुद्दा नहीं है – यह हर नागरिक के सूचना पाने के अधिकार से जुड़ा है।

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