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Chandrayaan-3: विक्रम लैंडर के ‘Hop’ प्रयोग ने चंद्रमा की सतह के खोले नए राज

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चंद्रयान-3 मिशन ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, मिशन के अंतिम चरण के दौरान विक्रम लैंडर द्वारा किए गए ‘हॉप एक्सपेरिमेंट’ (Hop Experiment) से प्राप्त आंकड़ों ने चंद्रमा की सतह के बारे में चौंकाने वाली और नई जानकारियां प्रदान की हैं।

क्या था विक्रम लैंडर का ‘हॉप’ प्रयोग?

मिशन के सफल समापन से ठीक पहले, इसरो के वैज्ञानिकों ने विक्रम लैंडर के इंजनों को दोबारा चालू कर उसे सतह से लगभग 40 सेंटीमीटर ऊपर उठाया और करीब 30-40 सेंटीमीटर दूर सुरक्षित रूप से दोबारा लैंड कराया। इस प्रक्रिया को ‘हॉप’ कहा गया। यह प्रयोग भविष्य के ‘सैंपल रिटर्न’ मिशनों और मानव मिशनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

नए शोध में क्या आया सामने?

फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के डॉ. के. दुर्गा प्रसाद के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन को ‘अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ द्वारा प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. Regolith (चंद्र धूल) के गुण: लैंडर के थ्रस्टर्स के कारण उड़ने वाली धूल के विश्लेषण से चंद्रमा की मिट्टी (रेगोलिथ) के भौतिक गुणों को समझने में मदद मिली।
2. तापमान और कटाव (Erosion): ‘ChaSTE’ पेलोड के माध्यम से लैंडिंग स्थल के आसपास के तापमान में आए बदलाव और मिट्टी के कटाव के साक्ष्य मिले हैं।
3. सतह की संरचना: इस प्रयोग ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास की सतह की सघनता और उसकी धारण क्षमता के बारे में नए डेटा सेट प्रदान किए हैं।

भविष्य के लिए महत्व

यह शोध न केवल चंद्रमा की उत्पत्ति को समझने में सहायक है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि भविष्य के लैंडर जब चंद्रमा पर उतरेंगे या वहां से उड़ान भरेंगे, तो वे वहां के पर्यावरण को कैसे प्रभावित करेंगे। भारत की यह वैज्ञानिक प्रगति वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान में एक नया अध्याय लिख रही है।

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