भारत

150 वर्षों का गौरव: ‘वंदे मातरम’ आज भी देश की धड़कन

सोमवार को लोकसभा में देशभक्ति के इस अमर प्रतीक ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ पर एक विशेष चर्चा आयोजित की जाएगी। इस चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। सदन में यह बताया जाएगा कि यह गीत कैसे आज़ादी के आंदोलन का प्रेरणा स्रोत बना, और किस तरह से यह देश के सांस्कृतिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।

वंदे मातरम का ऐतिहासिक सफर

‘वंदे मातरम’ का इतिहास भारत के राष्ट्रवाद से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 से 1875 के बीच मूल रूप से बंगला भाषा में लिखा। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में प्रकाशित किया गया। यह गीत मात्र साहित्य नहीं था, बल्कि उस दौर के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया और धीरे-धीरे यह आज़ादी की आवाज़ बन गया।

गीत से राष्ट्रीय गीत तक

1905 में दाखिनारंजन सेन ने इसे पहली बार संगीतबद्ध किया, और इसका जनमानस के साथ गहरा जुड़ाव बन गया। देश की आज़ादी के बाद, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे औपचारिक रूप से भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। तब से आज तक, ‘वंदे मातरम’ राष्ट्र के सम्मान, गौरव और समर्पण का प्रतीक बना हुआ है।

150वीं वर्षगांठ: 2025 में विशेष महत्व

साल 2025 में ‘वंदे मातरम’ के पूरे 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसी उपलक्ष्य में 8 दिसंबर को लोकसभा में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया है। इस चर्चा के दौरान गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका, और इसके सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाएगा। इस अवसर को देश की सामूहिक स्मृति को ताज़ा करने और नई पीढ़ी तक उसके संदेश को पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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