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हीटवेव (गर्मी की लहरें): सबसे खतरनाक मौसमीय आपदा बनती लू

हीटवेव या लू एक ऐसी स्थिति होती है जब किसी क्षेत्र में सामान्य से काफी अधिक तापमान लगातार कई दिनों तक बना रहता है। आमतौर पर इसे कम से कम पांच दिनों तक चलने वाली असामान्य रूप से गर्म मौसम की अवधि के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह स्थानीय मौसम और जलवायु की सामान्य स्थिति के आधार पर निर्धारित किया जाता है — यानी जो तापमान एक गर्म जलवायु वाले क्षेत्र के लिए सामान्य हो सकता है, वही तापमान किसी ठंडे क्षेत्र के लिए हीटवेव मानी जा सकती है।

कैसे बनती है हीटवेव?
हीटवेव तब बनती है जब ऊपरी वायुमंडल में उच्च दबाव वाली प्रणाली लंबे समय तक किसी क्षेत्र में बनी रहती है। यह प्रणाली हवा को नीचे की ओर धकेलती है, जिससे यह सतह के पास गर्मी को फँसा लेती है और ऊपर उठने से रोकती है। इसके कारण बारिश नहीं होती और गर्मी लगातार बढ़ती जाती है। कभी-कभी हवा के सामान्य प्रवाह की कमजोरी के कारण भी यह प्रणाली लंबे समय तक टिकी रह सकती है, जिससे गर्मी और अधिक तीव्र हो जाती है।

इतिहास में दर्ज खतरनाक लहरें
भारत में कई बार गर्मी ने जानलेवा रूप ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 1988 में लगभग 1300, 1998 में लगभग 2042, और 2003 में लगभग 3054 लोगों की जान हीटवेव से गई थी। 2015 की लहर भारत के इतिहास की पांचवीं सबसे घातक लहर बनी, जिसमें मार्च से जून के बीच 2,300 से अधिक मौतें दर्ज की गईं।

गर्मी के चलते हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। बुजुर्ग, बच्चे और बीमार लोग सबसे अधिक जोखिम में होते हैं। 2016 में पश्चिमी भारत में सैकड़ों लोग गर्मी के कारण अस्पताल में भर्ती हुए थे।

गर्मी का असर सिर्फ स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। कृषि, उद्योग, बिजली आपूर्ति और श्रमिकों की उत्पादकता पर इसका गहरा असर देखा गया है। अधिक तापमान से बिजली की खपत बढ़ जाती है, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव पड़ता है और ब्लैकआउट जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं।

हाल के वर्षों में भारत में हीटवेव से होने वाली मौतों में कमी देखी गई है। यह भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा समय पर चेतावनियों, राज्यों द्वारा तैयार किए गए हीट एक्शन प्लान और जनजागरूकता अभियानों का परिणाम है। IMD ने हाल ही में हीट इंडेक्स की शुरुआत की है, जो तापमान और आर्द्रता को मिलाकर गर्मी की तीव्रता का आंकलन करता है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
सिर्फ भारत ही नहीं, मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो अमेरिका ने भी जून-जुलाई 2012 में एक घातक हीटवेव का सामना किया था, जिसमें 8,000 से अधिक तापमान रिकॉर्ड टूट गए थे। शिकागो जैसी जगहों पर सड़कें तक उखड़ गई थीं और देशभर में सैकड़ों मौतें हुईं।

एक अध्ययन में पाया गया है कि 1983 से 2016 के बीच अत्यधिक गर्मी के जोखिम में तीन गुना वृद्धि हुई है। यदि जनसंख्या वृद्धि को अलग कर दें, तो भी जोखिम में 50% की वृद्धि हुई है।

प्रभाव और खतरे
हीटवेव कोई तूफान या बाढ़ जितनी नाटकीय नहीं लगती, लेकिन अमेरिका में इससे मरने वालों की संख्या किसी भी अन्य मौसम आपदा से अधिक है। यह न सिर्फ मानव जीवन के लिए खतरा है, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालती है — कृषि, औद्योगिक गतिविधियां, बिजली की आपूर्ति और श्रमिकों की उत्पादकता सभी प्रभावित होते हैं। अधिक तापमान से बिजली की खपत बढ़ जाती है जिससे ग्रिड पर दबाव आता है और कई बार ब्लैकआउट की स्थिति बन जाती है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव
हीटवेव का सबसे बड़ा असर मानव शरीर की थर्मोरेग्यूलेशन प्रणाली पर होता है। जब शरीर खुद को ठंडा नहीं रख पाता तो हीट एग्जॉस्शन और फिर हीट स्ट्रोक जैसी स्थितियां बनती हैं। अत्यधिक पसीना, कमजोरी, मतली, भ्रम और मांसपेशियों में ऐंठन इसके सामान्य लक्षण हैं। अगर समय रहते इलाज न हो, तो यह स्थिति जानलेवा हो सकती है। हीट स्ट्रोक में शरीर का तापमान 104°F (40°C) या उससे अधिक पहुंच जाता है, जिससे दिल, फेफड़े, किडनी और मस्तिष्क जैसे जरूरी अंगों को नुकसान हो सकता है।

हीटवेव एक गंभीर और बढ़ती हुई प्राकृतिक आपदा है, जो जलवायु परिवर्तन के चलते अधिक तीव्र और लगातार होती जा रही है। इससे निपटने के लिए समय पर चेतावनी, स्वास्थ्य सेवाओं की तत्परता और जागरूकता जरूरी है।

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