गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: न्यायिक कार्यों में AI के इस्तेमाल पर लगी रोक

गुजरात हाई कोर्ट ने न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दखल को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण नीति जारी की है। 4 अप्रैल, 2026 को जिला न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में अनावरण की गई इस नीति के अनुसार, अब न्यायाधीश न्यायिक निर्णय लेने या आदेश लिखने के लिए AI का उपयोग नहीं कर सकेंगे।
क्या है नया नियम?
हाई कोर्ट की इस नई पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य न्याय वितरण की गति और गुणवत्ता में सुधार करना है, न कि मानवीय विवेक (Judicial Reasoning) को तकनीक से बदलना। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि:
1. निर्णय प्रक्रिया पर रोक: AI का उपयोग किसी भी प्रकार के निर्णय लेने, न्यायिक तर्क देने, आदेश का मसौदा तैयार करने या फैसले (Judgment) तैयार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
2. मानवीय जिम्मेदारी: कोई भी न्यायाधीश अपने नाम से जारी होने वाले आदेश के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होगा। वह अपनी इस जिम्मेदारी को AI के साथ साझा या डेलिगेट नहीं कर सकता।
3. गोपनीयता और डेटा सुरक्षा: कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं कि AI टूल्स में पक्षकारों के नाम, पते, गोपनीय कानूनी रणनीतियां या संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा नहीं डाला जाना चाहिए।
AI के उपयोग की सीमाएं और जोखिम
अदालत ने AI से जुड़े कई गंभीर खतरों की ओर इशारा किया है, जिनमें हैलुसिनेशन (गलत जानकारी को सच बताना), पूर्वाग्रह (Bias), और न्यायिक स्वतंत्रता का हनन शामिल है। इसी कारण, साक्ष्यों के मूल्यांकन या तथ्यों की खोज जैसे कार्यों में भी AI के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया है।
कहाँ दी गई है छूट?
हालाँकि, कोर्ट तकनीक के पूरी तरह खिलाफ नहीं है। AI का उपयोग निम्नलिखित प्रशासनिक और उत्पादकता कार्यों के लिए किया जा सकता है:
1. प्रशासनिक कार्य: सर्कुलर और नोटिस तैयार करना (जो सार्वजनिक डोमेन में हों)।
2. कानूनी शोध: पिछले फैसलों (Precedents) को खोजने और न्यायिक विश्लेषण में सहायता लेना, बशर्ते उसका सत्यापन मानवीय विवेक से किया जाए।
3. IT विभाग: कोड जनरेशन और ऑटोमेशन जैसे कार्यों के लिए।
गुजरात हाई कोर्ट की यह नीति “मानवीय सर्वोच्चता” (Human Supremacy) को पुन: स्थापित करती है। यह सुनिश्चित करती है कि न्याय केवल डेटा और एल्गोरिदम पर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और विवेक पर आधारित हो।





