इस बार ला-नीनो इफ़ेक्ट के चलते पड़ेगी कड़ाके की ठण्ड, जानें क्या होता है अल-नीनो एवं ला-नीना

इस बार ला-नीनो इफ़ेक्ट के चलते पड़ेगी कड़ाके की ठण्ड, जानें क्या होता है अल-नीनो एवं ला-नीना
देश के उत्तर भाग में सर्दियां धीरे-धीरे पैर पसार रही हैं। रविवार से कई पहाड़ी इलाके में बर्फबारी शुरू हो गई है। बीते दिन जम्मू कश्मीर, हिमाचल व उत्तराखंड के कई हिस्सों में भी भारी बर्फ़बारी हुई। ऐसे में देश के उत्तरी राज्यों में तापमान गिर रहा है, वहीं मौसम विभाग ने उत्तर भारत के कई राज्यों में बारिश का आदेश भी जताया है, जिससे ठंड के और भी बढ़ने की उम्मीद है।
मौसम विभाग ने बताया है कि इस बार दिसंबर सबसे ठंडा महीना साबित होगा। मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि दिसंबर में कड़ाके की सर्दी पड़ेगी। उत्तर भारत के लोगों को तापमान में भारी गिरावट के साथ-साथ ठिठुरन और कोहरे की मार भी झेलनी पड़ेगी। IMD ने इस बार की ठंड कारण ‘ला नीना इफेक्ट’ बताया है।
दरअसल देश में सर्दी,गर्मी, व बारिश होने का बड़ा कारण ‘अल-नीनो व ला नीना इफेक्ट’ के चलते होता है। तो आइए जानते हैं कि क्या होता है अल-नीनो एवं ला-नीना इफ़ेक्ट-
अल-नीनो एवं ला-नीना एक तरह का मौसम पैटर्न है। ये ऐसे मौसम के पैटर्न हैं जो बहुत ही जटिल माने गए हैं। ये दोनों पैटर्न तब उत्पन्न होते हैं जब प्रशांत महासागर के क्षेत्र में समुद्र के तापमान में भिन्नता आती है उन घटित के कारण घटित होते हैं। ये अल नीनो-दक्षिणी दोलन चक्र की विपरीत अवस्थाएं होती हैं। ENSO चक्र पूर्व-मध्य विषुवतीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में महासागर एवं वायुमंडल के मध्य तापमान में उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। अल-नीनो और ला-नीना की घटनाएं आमतौर पर 9 से 12 महीने तक चलती हैं, लेकिन कुछ लंबे समय तक चलने वाली घटनाएं वर्षों तक बनी रह सकती हैं।
जानें क्या होता है अल नीनो इफ़ेक्ट
अल-नीनो इफेक्ट मौसम संबंधी एक विशेष घटना की एक स्थिति है, जो मध्य और पूर्वी प्रशांत सागर में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक होने पर बनती है। आसान भाषा में समझे तो इस इफ़ेक्ट की वजह से तापमान काफी गर्म हो जाता है। इसकी वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में रहने वाला गर्म सतह वाला पानी भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ने लगता है, जिससे भारत के मौसम पर असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में भयानक गर्मी का सामना करना पड़ता है और सूखे के हालात बनने लगते हैं। बता दें कि एल नीनो मध्य और पूर्व-मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में होता है। यह हर 2 से 5 साल में घटित होता है।
ला नीना और एल नीनो, उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में होने वाले प्राकृतिक जलवायु पैटर्न हैं। ये पैटर्न, एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के नाम से जाने जाते हैं। इन दोनों पैटर्न में कई अंतर हैं।
जानें क्या होता है ला-नीना इफ़ेक्ट
अल-नीनो से ला-नीना का प्रभाव विपरित होता है। इसमें अमेरिकी महाद्वीपों के पश्चिमी तटों के पास के प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है जिससे व्यापारिक पवनें बहुत मजबूत हो जाती हैं। इससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी एशिया की ओर खिसकने लगता है। ला नीना उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में सामान्य से अधिक ठंडे पानी के निर्माण के कारण होता है। ला नीना की घटनाओं के दौरान हवाएं सामान्य से भी अधिक तेज होती हैं। यह मानसून के रुख को तय करने वाली घटना है। ला नीना शब्द स्पेनिश भाषा का है जिसका अर्थ है छोटी बच्ची होता है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत में ‘ला नीना इफेक्ट’ देखने को मिल रहा है। इससे पहले भी 2001 में सर्दियों के दौरान ‘ला नीना इफेक्ट’ का असर दिखा था, जो कि 7 महीने तक था। वहीं अब 22 साल बाद एक बार फिर ‘ला नीना इफेक्ट’ ने सर्दियों में वापसी कर ली है।





