दवा खोज में एआई का कमाल, रिसर्च की रफ्तार सालों से घटकर कुछ महीनों में

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से हर उद्योग को बदल रहा है और अब फार्मा सेक्टर भी इसकी सबसे बड़ी क्रांति का गवाह बनने जा रहा है। दवा खोज और रिसर्च में जहां पहले 10 से 15 साल लगते थे, अब वही काम कुछ महीनों में हो सकता है। यह दावा किया है गूगल की कंपनी डीपमाइंड के सीईओ और नोबेल पुरस्कार विजेता डेमिस हासाबिस ने।
ब्लूमबर्ग टीवी को दिए एक इंटरव्यू में हासाबिस ने कहा कि आने वाले सालों में एआई दवा बनाने की प्रक्रिया को बेहद तेज कर देगा। उन्होंने कहा – “मैं चाहता हूं कि आने वाले समय में सालों का काम कुछ ही महीनों में हो जाए। मुझे लगता है कि यह संभव है, शायद इससे भी तेज।”
डीपमाइंड की सहायक कंपनी आइसोमॉर्फिक लैब्स एआई का इस्तेमाल कर जटिल बायोलॉजिकल सिस्टम और दवाओं की संरचना को मॉडल करती है। एआई तेजी से बड़े डेटा का विश्लेषण कर सकता है और दवा व प्रोटीन के बीच होने वाली क्रियाओं की भविष्यवाणी कर सकता है। इस तकनीक से वैज्ञानिक कुछ हफ्तों में ही संभावित दवाओं की पहचान कर सकते हैं, जो पहले सालों में होती थी।
अभी दवाओं की खोज में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती टेस्ट में सफल दिखने वाले कई यौगिक आगे चलकर असफल हो जाते हैं। कभी असर नहीं दिखता और कभी खतरनाक साइड इफेक्ट सामने आते हैं। हासाबिस का कहना है कि एआई की भविष्यवाणी करने की क्षमता इस असफलता को काफी हद तक कम कर सकती है।
डीपमाइंड के मॉडल प्रोटीन फोल्डिंग और रासायनिक प्रतिक्रियाओं को सिम्युलेट करते हैं। इससे वैज्ञानिक पहले से जान पाते हैं कि कोई दवा शरीर में कैसे काम करेगी। एआई नई और अनोखी दवाओं की संरचना भी सुझा सकता है, जिन्हें पारंपरिक तरीके नजरअंदाज कर देते हैं।
एआई की मदद से रिसर्चर अब उन्हीं यौगिकों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे जिनकी सफलता की संभावना ज्यादा है। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी। खास बात यह है कि महामारी जैसी आपातकालीन स्थितियों में एआई बेहद मददगार साबित हो सकता है। नई बीमारियों के इलाज की दवाएं कम समय में तैयार की जा सकेंगी।
हासाबिस ने बताया कि एआई का इस्तेमाल पर्सनलाइज्ड मेडिसिन यानी हर व्यक्ति की जेनेटिक प्रोफाइल और शरीर की जरूरतों के हिसाब से दवा बनाने में भी होगा। इससे मरीजों के लिए ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित इलाज तैयार किया जा सकेगा।





