
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आज का दिन काफी चुनौतीपूर्ण रहा। गुरुवार, 30 अप्रैल 2026 को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 32 पैसे टूटकर 95.20 के सर्वकालिक निचले स्तर (All-time low) पर जा गिरा। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की मजबूती ने घरेलू मुद्रा पर भारी दबाव बनाया है।
रुपये में गिरावट के मुख्य कारण
रुपये के इस ऐतिहासिक अवमूल्यन के पीछे कई प्रमुख वैश्विक और आर्थिक कारक जिम्मेदार हैं:
• कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $121–$122 प्रति बैरल के आसपास पहुँच गई हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर भारत के आयात बिल को बढ़ा देती है।
• पश्चिम एशिया में तनाव: ईरान से जुड़े व्यवधानों और ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इस तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर की ओर भाग रहे हैं।
• मजबूत अमेरिकी डॉलर: अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने और वाशिंगटन-तेहरान के बीच बढ़ते राजनयिक तनाव के कारण डॉलर इंडेक्स में मजबूती आई है।
फॉरेक्स ट्रेडर्स के मुताबिक, इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.01 पर खुला था, लेकिन जल्द ही गिरावट बढ़ती गई। बुधवार को भी रुपया 20 पैसे कमजोर होकर 94.88 पर बंद हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले दिनों में रुपये में और भी गिरावट देखी जा सकती है। इस गिरावट का सीधा असर आम जनता पर पड़ सकता है, क्योंकि आयातित सामान (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और तेल) महंगे होने से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।





