Raghav Chadha का Masterstroke? दो-तिहाई नियम ने कैसे बदली सियासत

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (AAP) के कई सांसदों के कथित रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की चर्चा के बाद संसद की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
चड्ढा और अन्य सांसदों ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से दल बदलना कानूनी रूप से संभव है। इस कदम के बाद AAP को बड़ा राजनीतिक झटका लगा और राज्यसभा में उसकी संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई।
दल-बदल कानून पर फिर शुरू हुई बहस
यह पूरा मामला संविधान की दसवीं अनुसूची यानी Anti-Defection Law पर फिर से बहस को तेज कर रहा है। मौजूदा नियमों के अनुसार यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी अन्य पार्टी में शामिल होते हैं, तो इसे “विलय” माना जाता है और उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती।
इस मामले में भी यही संख्या निर्णायक रही, जिससे चड्ढा समूह को कानूनी रूप से पार्टी बदलने की अनुमति मिल गई।
चड्ढा का पुराना प्रस्ताव और उसका प्रभाव
गौरतलब है कि अगस्त 2022 में राघव चड्ढा ने संसद में एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें उन्होंने दल-बदल कानून को और सख्त करने की बात कही थी। प्रस्ताव में उन्होंने सीमा को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करने और दल बदलने वाले सांसदों पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का सुझाव दिया था।
अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता, तो मौजूदा राजनीतिक बदलाव को अंजाम देना काफी मुश्किल हो जाता।
राजनीतिक असर और आगे की स्थिति
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक स्थिरता और दल-बदल कानून की सख्ती पर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की जरूरत बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे पार्टी व्यवस्था और प्रतिनिधित्व के खिलाफ भी माना जा रहा है।
फिलहाल यह मामला आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए राजनीतिक और कानूनी स्तर पर महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।





