लाइफस्टाइल

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल: दुनिया की सबसे सफल पर्यावरणीय संधि

1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत में बड़ा छिद्र हो गया है। यह पूरी दुनिया के लिए एक झटका था। जांच में सामने आया कि इसके पीछे इंसानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली CFCs, हैलॉन्स और अन्य ओज़ोन नष्ट करने वाली गैसें हैं। यह पहली बार था जब एक वैश्विक पर्यावरणीय संकट के लिए इंसानी गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया।

मॉन्ट्रियल में हुआ ऐतिहासिक समझौता

16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल (कनाडा) में 197 देशों ने मिलकर तय किया कि CFCs और अन्य हानिकारक गैसों का उत्पादन और इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाएगा। इसे ही मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कहा गया। यह संयुक्त राष्ट्र की पहली “यूनिवर्सल रैटिफिकेशन” वाली संधि बनी, जिसमें सभी देश शामिल हुए।

यह सफल क्यों हुआ?

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को दुनिया की सबसे सफल पर्यावरणीय संधि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित स्पष्ट लक्ष्य और समयबद्ध कार्ययोजना अपनाई गई। विकसित देशों ने विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता दी ताकि वे हानिकारक गैसों के विकल्प खोज सकें। इस सहयोगी दृष्टिकोण ने प्रोटोकॉल को केवल कागज तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि वास्तविक नतीजे दिए।

परिवर्तन के परिणाम

आज 198 देश इसका हिस्सा हैं और 99% हानिकारक ओज़ोन नष्ट करने वाले पदार्थ (ODS) का इस्तेमाल खत्म किया जा चुका है। NASA और WMO के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार अंटार्कटिक ओज़ोन होल धीरे-धीरे छोटा हो रहा है और ओज़ोन परत 2040–2060 तक पूरी तरह रिकवर होने की राह पर है।

भारत की भूमिका

भारत 1992 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल से जुड़ा। इसके बाद “ODS (Regulation and Control) Rules” 2000 लागू किए गए, जिनके जरिए उद्योगों को CFC-फ्री रेफ्रिजरेटर, AC और एयरोसोल स्प्रे बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। यह कदम भारत में पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देने में अहम रहा।

किगाली अमेंडमेंट: अगला कदम

2016 में किगाली अमेंडमेंट के जरिए CFCs के बाद HFCs को भी कम करने की योजना बनाई गई। HFCs ओज़ोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन ये ग्रीनहाउस गैसें हैं और क्लाइमेट चेंज को बढ़ाती हैं। इस तरह मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अब ओज़ोन परत ही नहीं बल्कि ग्लोबल वॉर्मिंग कम करने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

आज की स्थिति और सीख

2025 में WMO और NASA के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि ओज़ोन परत की औसत मोटाई 1990 के स्तर पर लौटने लगी है। अंटार्कटिक ओज़ोन होल लगातार छोटा हो रहा है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल साबित करता है कि अगर दुनिया एकजुट हो तो पर्यावरणीय संकटों को सुलझाना संभव है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख है कि विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिलकर पृथ्वी को बचा सकते हैं।

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