जस्टिस यशवंत वर्मा के शपथ ग्रहण के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर

जस्टिस यशवंत वर्मा के शपथ ग्रहण के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उनके स्थानांतरण आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। वर्तमान में जस्टिस वर्मा अपने आधिकारिक आवासीय परिसर में अवैध नकदी रखने के आरोपों पर इन-हाउस जांच का सामना कर रहे हैं।
अधिवक्ता विकास चतुर्वेदी द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण और प्रस्तावित शपथ संविधान का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने पहले ही उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपने का निर्देश दिया है, तो फिर उन्हें शपथ क्यों दिलाई जा रही है।
अधिवक्ता अशोक पांडे के माध्यम से दायर एक अन्य जनहित याचिका में कहा गया है कि एक न्यायाधीश अपने पद के कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने की शपथ लेता है, लेकिन यदि उन्हें न्यायिक कार्य से वंचित किया जाता है, तो यह प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि किसी न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही उनके पद से हटाया जा सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि उच्च न्यायालय पुष्टि करता है कि जस्टिस वर्मा को न्यायिक कार्य आवंटित किया जाएगा, तो शपथ ग्रहण समारोह पर कोई आपत्ति नहीं होगी। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को न्यायाधीशों को कार्य आवंटित करने का अधिकार है, और इस प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने जस्टिस वर्मा के मामले में गठित तीन सदस्यीय जांच समिति को असंवैधानिक और अवैध बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी समिति का गठन तब किया जाता है जब आवश्यक संख्या में सांसदों द्वारा प्रस्ताव पारित किया जाता है। याचिका में मांग की गई है कि जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण की अधिसूचना को रद्द किया जाए।
गौरतलब है कि 22 मार्च को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इन-हाउस जांच के तहत जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस मामले से जुड़ी रिपोर्टों को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया।
जस्टिस वर्मा ने नकदी रखने के आरोपों से इनकार किया है और इसे अपने खिलाफ साजिश बताया है। 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और आपराधिक जांच शुरू करने की मांग वाली याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आंतरिक जांच के नतीजों का इंतजार किया जाना चाहिए।





