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National Handloom Day: भारत की बुनावट में बसी कहानियाँ

हर साल 7 अगस्त को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (National Handloom Day) न केवल हमारे कारीगरों के शिल्प को सम्मान देने का दिन है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को पहचानने का अवसर भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैसे देशभर की बुनाई और कढ़ाई की परंपराएँ – सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और पहचान का हिस्सा हैं।

आज हम आपको भारत की कुछ मशहूर और अनोखी हथकरघा कलाओं से मिलवाते हैं – जो सिर्फ धागों से नहीं, भावनाओं और कहानियों से बुनी जाती हैं।

1.बनारसी ब्रोकेड – उत्तर प्रदेश

कहां की कला: बनारस (वाराणसी), उत्तर प्रदेश

क्यों खास है: मुगलों के दौर से चली आ रही ब्रोकेड बुनाई परंपरा। बनारसी ब्रोकेड में रेशमी साड़ियों पर असली ज़री, महीन बुट्टे और परंपरागत पैटर्न जैसे बेल-बूटे व कलगियाँ बुनी जाती हैं।

क्या बनता है: साड़ियाँ, दुपट्टे, शेरवानी, और अब हैंडबैग्स तक

बनने में समय: एक साड़ी बनने में 15 दिन से लेकर 6 महीने तक लग सकते हैं, डिज़ाइन की जटिलता के अनुसार।

बाजार मूल्य: ₹5,000 से शुरू होकर ₹1 लाख तक या उससे ऊपर तक

2.कांथा कढ़ाई – पश्चिम बंगाल

कहां की कला: बीरभूम, शांतिनिकेतन और मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल

क्यों खास है: यह कढ़ाई पुराने कपड़ों को रीसायकल कर उन्हें नया रूप देने की लोक कला है। हर टांका एक कहानी बुनता है – मिथक, प्रकृति और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से प्रेरित।

क्या बनता है: साड़ियाँ, दुपट्टे, बेडशीट्स, वॉल हैंगिंग्स और आज के समय में कुर्तियाँ और बैग

बनने में समय: एक मध्यम कांथा साड़ी में 2-3 महीने लगते हैं

बाजार मूल्य: ₹2,000 से ₹25,000 तक

3.पटोला – गुजरात

कहां की कला: पाटन और राजकोट, गुजरात

क्यों खास है: डबल इकट तकनीक जिसमें धागों को पहले रंगा जाता है, फिर बुनाई होती है – जिससे दोनों ओर से समान डिज़ाइन दिखता है। यह दुनिया की सबसे जटिल बुनाई शैलियों में से एक है।

क्या बनता है: केवल साड़ियाँ, जो पारंपरिक रूप से शाही वर्गों और समृद्ध परिवारों द्वारा पहनी जाती थीं।

बनने में समय: एक डबल इकट पटोला साड़ी में 6 महीने से 1 साल तक

बाजार मूल्य: ₹1.5 लाख से ₹8 लाख तक

4.फुलकारी – पंजाब

कहां की कला: पंजाब के गांवों में खासकर अमृतसर, पटियाला और होशियारपुर

क्यों खास है: रंग-बिरंगे मोटे सूती धागों से किया गया फूलों का डिज़ाइन। पहले शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर महिलाओं द्वारा खुद कढ़ा जाता था।

क्या बनता है: दुपट्टा, ओढ़नी, कुर्तियाँ, बेड कवर और आजकल बैग्स व डेकोर

बनने में समय: एक विस्तृत दुपट्टा बनाने में 3-4 महीने

बाजार मूल्य: ₹1,000 से ₹15,000 तक (पुरानी और हैंडमेड फुलकारी दुर्लभ होती हैं)



5.पोचमपल्ली इकट – तेलंगाना

कहां की कला: नलगोंडा और यादाद्री ज़िले, तेलंगाना

क्यों खास है: यह इकट शैली अपने ज्योमेट्रिक डिज़ाइनों और रंग संयोजन के लिए मशहूर है। यह प्रक्रिया गणितीय सटीकता मांगती है क्योंकि पहले धागों को रंगा जाता है, फिर बुना।

क्या बनता है: साड़ियाँ, दुपट्टे, कुर्तियाँ, स्टोल और अब स्टाइलिश होम डेकोर
बनने में समय: 10 दिन से 1 महीना तक

बाजार मूल्य: ₹3,000 से ₹30,000 तक

विशेष सम्मान: UNESCO द्वारा “Best Design” के रूप में मान्यता

6.जामदानी – पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश

कहां की कला: पश्चिम बंगाल (नदिया, मुर्शिदाबाद) और ढाका (बांग्लादेश)

क्यों खास है: मलमल की महीन बुनावट पर बेहद बारीक हाथ की बुट्टा बुनाई। यह कभी नवाबों और शाही घरानों की पसंद हुआ करती थी।

क्या बनता है: हल्की, पारदर्शी साड़ियाँ जिन पर हवा जैसे डिज़ाइन उकेरे जाते हैं

बनने में समय: एक जटिल जामदानी साड़ी में 3 महीने से 1 साल तक

बाजार मूल्य: ₹10,000 से ₹1 लाख+

विशेष मान्यता: UNESCO की Intangible Cultural Heritage लिस्ट में शामिल

7.कांथा और कटक सिल्क – उड़ीसा

कहां की कला: कटक, भुवनेश्वर और आसपास के क्षेत्र

क्यों खास है: कटक सिल्क की खासियत है इसकी चमक और महीनता, और कांथा में हाथ से शंख, मंदिर, हाथी-घोड़े, पौराणिक डिज़ाइन काढ़े जाते हैं। पारंपरिक डिज़ाइन में आधुनिक प्रयोग भी खूब होते हैं।

क्या बनता है: कांथा साड़ियाँ, सिल्क दुपट्टे, कुर्तियाँ, ब्लाउज़ और वॉल डेकोर

बनने में समय: 1 साड़ी में 2 से 4 महीने तक

बाजार मूल्य: ₹5,000 से ₹50,000+

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