ISRO जल्द लॉन्च करेगा ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट, रक्षा और निगरानी में आएगी नई क्रांति

अब अंतरिक्ष से धरती को देखने का तरीका पूरी तरह बदलने वाला है। हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग (HRS) तकनीक के जरिए अब वो चीजें भी देखी जा सकेंगी, जो आम आंखों को नजर नहीं आतीं। इसी तकनीक से लैस EOS-N1 ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट को इसरो जल्द ही PSLV-C62 मिशन के जरिए अंतरिक्ष में भेजने जा रहा है। यह सैटेलाइट DRDO द्वारा विकसित किया गया है।
क्या है हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक?
पहले सैटेलाइट तस्वीरों में सिर्फ कुछ रंगों के आधार पर अंदाजा लगाया जाता था कि नीचे क्या है — जैसे हरियाली देखकर जंगल या घुमाव देखकर नदी।
लेकिन हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक इससे कहीं आगे है। इसमें सैकड़ों बेहद बारीक रंगों और रोशनी की तरंगों को रिकॉर्ड किया जाता है, जिनमें ऐसी रोशनी भी शामिल होती है जो इंसानी आंख नहीं देख सकती।
हर जमीन, पेड़, पानी या सामग्री रोशनी को अलग-अलग तरीके से परावर्तित करती है। इस वजह से हर चीज का अपना अलग “लाइट सिग्नेचर” या पहचान चिन्ह बन जाता है, जिससे यह पता चल जाता है कि जमीन पर असल में क्या मौजूद है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
वैज्ञानिक अलग-अलग मिट्टी, पौधों और सतहों के लाइट पैटर्न पहले से रिकॉर्ड कर लेते हैं। सैटेलाइट से मिलने वाला डेटा इन्हीं पैटर्न से मिलाया जाता है।
जमीन पर इस काम के लिए छोटे पोर्टेबल उपकरण भी इस्तेमाल किए जाते हैं, जिन्हें स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर कहा जाता है।
GIS तकनीक के साथ मिलकर यह सिस्टम नक्शों को और ज्यादा सटीक बना देता है।
रक्षा क्षेत्र के लिए क्यों है खास?
हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक आधुनिक रक्षा रणनीति में बेहद अहम मानी जा रही है।
* जमीन की पहचान: यह बताया जा सकता है कि कौन-सी जमीन पर टैंक या वाहन आसानी से चल सकते हैं।
* छिपे खतरे पकड़ने में मदद: नकली कवर, छुपाए गए हथियार या असामान्य गतिविधियां आसानी से पहचानी जा सकती हैं।
* बेहतर योजना: 3D नक्शों की मदद से ऑपरेशन की पहले से सटीक प्लानिंग हो सकती है।
* आपदा निगरानी: बाढ़, भूकंप या भूस्खलन जैसी स्थितियों पर भी नजर रखी जा सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट के लॉन्च से भारत की रक्षा क्षमता और रणनीतिक निगरानी में बड़ी मजबूती आएगी और देश अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक और कदम आगे बढ़ाएगा।





