Independence Day | देश में कैसा था 14 -15 अगस्त 1947 की रात का मंज़र

लो फिर से वो नजारा याद कर लें
शहीदों के दिल में थी जो ज्वाला वो याद कर लें
जिसमें बहकर आजादी पहुंची थी किनारे पर कभी
बलिदानियों के खून की वो धारा याद कर लें!
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

15 अगस्त 1947, यह बात तो हम सब जानते है कि भारत ने इस दिन आज़ादी का स्वाद चखा था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके लिए अनगिनत देशभक्तों ने न केवल अपना खून बहाया था, बल्कि कईयों ने देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था. इतने त्याग, बलिदान, कष्ट, अत्याचार आंदोलन और कुर्बानी के बाद जब भारत को आजादी मिली तो उस वक्त भारत की क्या स्थिति थी ?
तो चलिए जानते है कि आखिर आजादी के उस दौर में क्या हुआ था कैसे थे आजादी मिलने से पहले वो 2 दिन….
13 अगस्त 1947 का दिन, ऐसा था देश का माहौल.
200 वर्षों की गुलामी के बाद 13 अगस्त 1947 को देश का बंटवारा हो चुका था. जिसके बाद से पूरे देश में अफरातफरी का माहौल था. एक तरफ लोगों में आजादी की खुशी थी तो दूसरी तरफ बंटवारे का दर्द. हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग अपने सुरक्षित भविष्य की तलाश में आशाओं की तोकरी लिए बॉर्डर क्रॉस कर रहे थे, लेकिन लोगों में अपनी धरती, अपनी जमीन जहां उन्होंने अपना बचपन जिया उसे छोड़ने का दुख बयान नहीं किया जा सकता.
13 अगस्त को बंटवारे के बीच दंगे भड़क उठे थे और लोग एकदूसरे को मारने काटने में लगे थे. इतना ही नहीं, पाकिस्तान से जो ट्रेनें भारत आ रही थीं, उनकी बोगियों से लाशें निकल रही थीं और चारों ओर खून खराबा पसरा था.
14 अगस्त 1947 की रात
14 अगस्त 1947 की रात को जब संविधान सभा की बैठक हो रही थी तो राष्ट्रपिता का नाम लेकर शुरु हुई उस सभा के बाहर महात्मा गांधी की जय के नारे लगाये जा रहे थे, लेकिन इन सब के बीच महात्मा गांधी वहां मौजूद नहीं थे. दरअसल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच छिड़े सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए वह पश्चिम बंगाल के नोआखली में 24 घंटे के अनशन पर बैठ गए थे. उस वक्त महात्मा गांधी ने किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया और न ही तिरंगा फहराया था.
पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन प्लान’ की भेंट चढ़ा था. दरअसल 15 अगस्त, 1946 को उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ ‘डायरेक्ट एक्शन’ (सीधी कार्रवाई) का फरमान जारी कर दिया था. कलकत्ता में 72 घंटों के भीतर 6 हजार से अधिक लोग मारे गए थे. 20 हजार से अधिक घायल हो गए थे. इस दौरान 1 लाख से अधिक बेघर हो गए थे. बता दे कि इसे कलकत्ता किलिंग भी कहा जाता है.
13 अगस्त के एक दिन बाद यानी 14 अगस्त पाकिस्तान की आजादी का दिन मुकर्रर हुआ. वहीं लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के तहत 15 अगस्त 1947 को आजादी का ऐलान करने का दिन तय किया गया क्योंकि इसी दिन 1945 में जापान ने आत्मसमर्पण किया था.
15 अगस्त के दिन आज़ादी मिलने पर भारत ने जताया था विरोध
आजादी के जश्न के लिए 15 अगस्त की तारीख तय हो गई मगर ज्योतिषियों ने इसका जमकर विरोध किया क्योंकि ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह दिन अशुभ और अमंगलकारी था. ऐसे में दूसरी तारीखों का चुनाव किया जाने लगा मगर लॉर्ड माउंटबेटन 15 अगस्त की तारीख को नहीं बदलना चाहते थे. ऐसे में ज्योतिषियों बीच का रास्ता निकलते हुए 14-15 तारीख की मध्य रात्रि का समय तय किया. क्योंकि अंग्रेजी समयनुसार 12 बजे के बाद अगला दिन लग जाता है. जबकि भारतीय मान्यता के मुताबिक सूर्योदय के बाहर अगला दिन माना जाता है. ऐसे में आजादी के जश्न के लिए अभिजीत मुहूर्त को चुना गया जो 11 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 39 मिनट तक रहने वाला था और इसी बीच पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना भाषण भी समाप्त करना था.
13 अगस्त के एक दिन बाद यानी 14 अगस्त पाकिस्तान की आजादी का दिन मुकर्रर हुआ. वहीं लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के तहत 15 अगस्त 1947 को आजादी का ऐलान करने का दिन तय किया गया क्योंकि इसी दिन 1945 में जापान ने आत्मसमर्पण किया था.
15 अगस्त के दिन आज़ादी मिलने पर भारत ने जताया था विरोध
आजादी के जश्न के लिए 15 अगस्त की तारीख तय हो गई मगर ज्योतिषियों ने इसका जमकर विरोध किया क्योंकि ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह दिन अशुभ और अमंगलकारी था. ऐसे में दूसरी तारीखों का चुनाव किया जाने लगा मगर लॉर्ड माउंटबेटन 15 अगस्त की तारीख को नहीं बदलना चाहते थे. ऐसे में ज्योतिषियों बीच का रास्ता निकलते हुए 14-15 तारीख की मध्य रात्रि का समय तय किया. क्योंकि अंग्रेजी समयनुसार 12 बजे के बाद अगला दिन लग जाता है. जबकि भारतीय मान्यता के मुताबिक सूर्योदय के बाहर अगला दिन माना जाता है. ऐसे में आजादी के जश्न के लिए अभिजीत मुहूर्त को चुना गया जो 11 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 39 मिनट तक रहने वाला था और इसी बीच पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना भाषण भी समाप्त करना था.
भाषण में मौजूद नहीं रहे बापू
जब राजधानी दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था उस वक्त महात्मा गांधी दिल्ली से हजारों किमी दूर पश्चिम बंगाल के नोआखली में थे और राज्य में शांति कायम करने का प्रयास कर रहे थे. पंडित नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर बताया था कि 15 अगस्त को देश का पहला स्वाधीनता दिवस मनाया जाएगा. आप राष्ट्रपिता हैं. इसमें शामिल होकर अपना आशीर्वाद दें. जिसके बाद महात्मा गांधी ने भी जवाब में पत्र लिखते हुए कहा था कि जब बंगाल में हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं. मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा.
15 अगस्त को नहीं फेहरा था झंडा.
हर साल प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से झंडा फहराते हैं लेकिन 15 अगस्त 1947 के दिन झंडा नहीं फहराया गया था. लोकसभा सचिवालय के एक शोध पत्र के मुताबिक, पंडित नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था और आज़ादी के अवसर पर भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज सेंट जॉर्ज किले पर फेहराया गया था.
इतना ही नहीं 15 अगस्त को भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण भी नहीं हुआ था. इसका फैसला 17 अगस्त को रेडक्लिफ लाइन की घोषणा से हुआ था. देश भले ही 1947 को आजाद हो गया हो लेकिन हिन्दुस्तान के पास अपना खुद का राष्ट्रगान नहीं था. हालांकि, रवींद्रनाथ टैगोर ने 1911 में ही जन गण मन को लिख दिया था मगर 1950 में वह राष्ट्रगान बन पाया था.
आज भारत की आजादी को 78 वर्ष पूरे हो चुके है लेकिन इस आज़ादी के संग्राम से ऐसे अनगिनत किस्से, कष्ट और दुःख है जिसका अंदाज़ा आज भी भारत नहीं लगा सकता. आज देश आज़ादी की 78 वी वर्षगांठ पर उन सभी वीर सैनिक और सैनानियों के त्याग, तपस्या और बलिदान का सम्मान करता है और साथ ही उनके त्याग को नमन करता है जिन्होंने आज़ादी के कई वर्षों बाद तक अनगिनत कष्ट सहे है.






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