ट्रंप के फैसलों से तिलमिलाया चीन, बोला- अमेरिका बढ़ा रहा है आर्थिक तनाव

अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने और चीन को कंप्यूटर चिप्स के निर्यात पर नियंत्रण संबंधी नए निर्देश जारी किए जाने पर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई है। चीन ने इन फैसलों को अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है और अमेरिका पर नए आर्थिक व व्यापारिक तनाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने ट्रंप के फैसलों को जेनेवा में हुई पिछली व्यापारिक बैठक में बनी आम सहमति का उल्लंघन करार दिया है। मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका के जवाबी टैरिफ के बावजूद चीन ने टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों को निलंबित रखते हुए समझौते का सम्मान किया, लेकिन अमेरिका ने अब एकतरफा तरीके से स्थिति को और जटिल बना दिया है।
चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए “दृढ़ और सशक्त कदम” उठाता रहेगा। मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका ने न केवल समझौते का उल्लंघन किया है, बल्कि खुद की गलतियों को छुपाने के लिए चीन पर दोष मढ़ने की कोशिश की है, जो पूरी तरह से अनुचित है।
इस विवाद की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “चीन ने हमारे साथ किए गए समझौते का पूरी तरह उल्लंघन किया है। अब समय आ गया है कि हम ‘मिस्टर नाइस गाइ’ बनना बंद करें।” ट्रंप ने कहा कि वे शी जिनपिंग से बात करके समाधान निकालने की कोशिश करेंगे, लेकिन फिलहाल अमेरिका को अपने रुख को और सख्त बनाना होगा।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में अमेरिका और चीन के बीच जेनेवा में उच्चस्तरीय व्यापारिक बैठक हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर लगे टैरिफ को 90 दिनों के लिए कम करने का निर्णय लिया था। अमेरिका ने चीनी वस्तुओं पर टैरिफ को 145 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया था, वहीं चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर कर 125 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया था।
इसके बावजूद, पिछले सप्ताह ट्रंप प्रशासन ने चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की और साथ ही चीन को हाई-टेक कंप्यूटर चिप्स की सप्लाई पर सख्त नियंत्रण लागू करने का निर्देश जारी किया, जिससे व्यापारिक तनाव दोबारा उभर आया है। फिलहाल दोनों देशों के बीच रिश्तों में लगातार खिंचाव बना हुआ है और विश्लेषकों का मानना है कि अगर बातचीत के रास्ते नहीं खुले, तो यह टैरिफ वार वैश्विक बाजारों को भी प्रभावित कर सकता है।





