भारत

बाल तस्करी और बच्चों का यौन शोषण भारत में गंभीर समस्या: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025 को सुनाए गए एक फैसले में कहा कि भारत में बाल तस्करी और बच्चों का यौन शोषण एक “गंभीर और चिंताजनक वास्तविकता” है। कोर्ट ने बताया कि यह गैरकानूनी गतिविधि संगठित गिरोहों के माध्यम से जारी है, जो बच्चों की भर्ती, परिवहन, रखने और शोषण के कई स्तरों पर काम करते हैं।

फैसले में कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बाल तस्करी के मामलों में बच्चे के बयान में छोटी-मोटी असंगतियों के बावजूद उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि किसी पीड़ित बच्चे का एकमात्र बयान भी पर्याप्त माना जाना चाहिए यदि वह विश्वसनीय और आश्वस्त करने वाला हो। पीड़ित बच्चे को अदालत में सहयोगी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति जॉयमलय बगची ने कहा कि बाल तस्करी और यौन शोषण ऐसे अपराध हैं जो बच्चे की गरिमा और शारीरिक अखंडता को सीधे प्रभावित करते हैं।

फैसले का संबंध बेंगलुरु में एक नाबालिग लड़की से था, जिसे जबरन यौन शोषण के लिए गिरोह ने फंसाया था। लगातार मना करने के बावजूद उसे एक किराए के अपार्टमेंट में बंद कर दिया गया, जहां से पुलिस ने नवंबर 2010 में उसे बचाया। कोर्ट ने गिरोह के सदस्यों की इम्मोरल ट्रैफिक (रोकथाम) एक्ट के तहत सजा को बरकरार रखा और कहा कि यह मामला राज्य की जिम्मेदारी और बच्चे की सुरक्षा में उपेक्षा को उजागर करता है।

न्यायमूर्ति बगची ने कहा कि अदालत को पीड़ित के बयान को असंभव या अविश्वसनीय मानकर खारिज नहीं करना चाहिए, केवल इसलिए कि उसने तुरंत विरोध नहीं किया। उन्होंने बताया कि यह अपराध अलग-अलग स्तरों पर फैलते हैं, जिससे पीड़ित के लिए सभी घटनाओं को स्पष्ट रूप से बताना मुश्किल होता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतें पीड़ित के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कमजोरियों को ध्यान में रखें, खासकर यदि बच्चा समाज के पिछड़े या हाशिए वाले वर्ग से आता हो। बच्चों के बयान की जांच संवेदनशीलता और वास्तविकता के साथ की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि यौन शोषण जैसी भयानक घटनाओं को बताना पीड़ित के लिए एक मुश्किल और दर्दनाक अनुभव होता है, जिससे उसे “दूसरी बार पीड़ा” का सामना करना पड़ सकता है।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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