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ब्लैक मंडे 2025: पाँच ऐतिहासिक विश्व आर्थिक संकटों की परछाईं में छिपा एक नया तूफान!

आज का दिन भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक और ब्लैक मंडे के रूप में दर्ज हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित जवाबी टैरिफ के असर से न सिर्फ वैश्विक बाजार लड़खड़ा गए हैं, बल्कि भारतीय शेयर बाजार में भी भूचाल आ गया है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में 5% से अधिक की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जिसने निवेशकों के अरबों रुपये स्वाहा कर दिए।

ट्रंप की टैरिफ नीति बन जायेगी मंदी का कारण ?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ लागू किया है, जिसके तहत भारत पर 26%, चीन पर 34% और यूरोपीय संघ पर 20% शुल्क लगाया गया है। यह नीति अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के इरादे से लाई गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक व्यापार में भारी गिरावट हो सकती है — ठीक वैसे ही जैसे 1929 में स्मूट-हॉले टैरिफ ऐक्ट के चलते हुआ था।

ब्लैक मंडे का विश्लेषण: आंकड़ों ने मचायी तबाही

बीएसई सेंसेक्स 3300 अंक गिरकर 71,900 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 1100 अंक टूटकर 21,800 पर पहुंचा। बैंक निफ्टी में 2000 अंकों की गिरावट देखी गई, जबकि निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 3400 अंकों की कटौती हुई। शुरुआती ट्रेडिंग में सेंसेक्स 3915 अंक टूटकर खुला था। इंडिया VIX (वॉलेटिलिटी इंडेक्स) में 57% का उछाल आया, जो 2015 के बाद की सबसे बड़ी बढ़त थी — यह डर और अनिश्चितता का स्पष्ट संकेत है।

लाल निशान में डूबे शेयर: टाटा समूह को बड़ा झटका

निफ्टी 50 के सभी शेयर लाल निशान में थे। शुरुआती कारोबार में Bharti Airtel हरे निशान में था, लेकिन वह भी गिरावट की चपेट में आ गया। टाटा समूह के शेयरों — Tata Steel, Trent, Tata Motors — को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा, जो गिरावट की अगुवाई कर रहे थे।

ग्लोबल त्रसादी: अमेरिका से शुरू, एशिया तक कोहराम

अमेरिकी बाजारों में बीते शुक्रवार को 5 साल की सबसे बड़ी गिरावट आई। डाओ जोंस 2250 अंक गिरा, नैस्डैक 1000 अंक टूटा और एसएंडपी 500 4% लुढ़क गया। चीन ने ट्रंप की टैरिफ नीति के जवाब में अमेरिकी उत्पादों पर 34% अतिरिक्त शुल्क लागू करने का ऐलान कर दिया है, जिससे वैश्विक ट्रेड वॉर की संभावना और बढ़ गई है। GIFT निफ्टी 900 अंक टूटा, निक्केई 6% गिरा और यूरोपीय बाजार भी लाल निशान में हैं।

शेयर मार्केट के डरावने संकेत: मंदी की आहट

कच्चा तेल 3% गिरकर $63 के पास आ गया है।

सोना $3000 से नीचे और चांदी 8 महीने के निचले स्तर $29 से नीचे फिसली है।

डॉलर इंडेक्स 102 के करीब और 10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 3.9% के नीचे गिर गई है।

क्रिप्टो मार्केट में बिटकॉइन 7% और Ethereum 13% लुढ़के।

भारत पर प्रभाव: क्या 2008 फिर से दोहराएगा इतिहास?

2008 की तरह भारत की IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसी निर्यात-आधारित इंडस्ट्रीज़ दबाव में आ सकती हैं। विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार की हालत और बिगाड़ दी — केवल शुक्रवार को FIIs ने 9525 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। यह सिलसिला जारी रहा, तो भारत की GDP ग्रोथ पर असर पड़ना तय है।

विश्व के 5 सबसे विनाशकारी वित्तीय संकट: एक झलक में

वित्तीय संकटों ने बार-बार वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोरा है, जिससे न केवल बाजार धराशायी हुए बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका भी प्रभावित हुई। आधुनिक इतिहास में ऐसे कई संकट आए हैं, जिनके प्रभाव वर्षों तक महसूस किए गए। आइए नज़र डालते हैं विश्व के पाँच सबसे विनाशकारी वित्तीय संकटों पर, जिन्होंने दुनिया की आर्थिक दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया।

1. 1772 का ऋण संकट: जब लंदन से उठी लहरें यूरोप तक पहुँचीं

यह संकट ब्रिटेन की राजधानी लंदन में शुरू हुआ, जब अलेक्जेंडर फोर्डिस नामक एक बैंकिंग साझेदार ने अपने भारी कर्ज के चलते फ्रांस में शरण ली। इससे ब्रिटिश बैंकिंग प्रणाली में दहशत फैल गई। लोग बैंकों से धन निकालने के लिए टूट पड़े, जिससे यह संकट स्कॉटलैंड, नीदरलैंड और अमेरिका तक पहुँच गया।

2. 1929 की महामंदी: जब वॉल स्ट्रीट के गिरने से दुनिया थम गई

1929 में वॉल स्ट्रीट के क्रैश ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया। इस “ग्रेट डिप्रेशन” ने लगभग एक दशक तक अमेरिका और अन्य औद्योगिक देशों की कमर तोड़ दी। 1933 तक अमेरिका में बेरोजगारी दर 25% तक पहुँच गई थी।

3. 1973 का तेल संकट: जब पेट्रोल बन गया राजनीतिक हथियार

ओपेक देशों ने चौथे अरब-इजरायल युद्ध के दौरान अमेरिका पर तेल प्रतिबंध लगा दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया। तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने मुद्रास्फीति और आर्थिक ठहराव (“स्टैगफ्लेशन”) का युग ला दिया, जिससे कई विकसित देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

4. 1997 का एशियाई संकट: जब टाइगर अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा गईं

थाईलैंड से शुरू हुआ यह संकट कुछ ही महीनों में मलेशिया, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया और सिंगापुर तक फैल गया। विदेशी निवेशकों ने पूंजी निकालनी शुरू की, और कई देशों की मुद्राएं तथा शेयर बाजार धराशायी हो गए। IMF को हस्तक्षेप कर बेलआउट पैकेज देना पड़ा।

5. 2007–08 का वैश्विक वित्तीय संकट: एक आधुनिक त्रासदी

अमेरिकी हाउसिंग बबल के फूटने से शुरू हुआ यह संकट लेहमैन ब्रदर्स जैसे दिग्गज बैंक को डुबो ले गया। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं। इसे 1930 के दशक के बाद का सबसे गंभीर संकट माना जाता है, जिसने लाखों लोगों की नौकरियां और जीवनभर की बचत खत्म कर दी।

इन ऐतिहासिक घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि वित्तीय स्थिरता कभी भी स्थायी नहीं होती — और नीति, सतर्कता तथा पारदर्शिता की आवश्यकता हर दौर में बनी रहती है।

अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियाँ वैश्विक बाजार की स्थिरता को बिगाड़ रहीं हैं | अमेरिकी का ये कदम पूरी दुनिया को एक और आर्थिक संकट की ओर ले जा रहा है |

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