फ्लाइट के टायर में छिपकर 94 मिनट का जानलेवा सफर, काबुल से दिल्ली पहुंचा 13 साल का लड़का

ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करना आम बात है. रोज़ाना सैकड़ों लोग पकड़े जाते हैं—कभी टॉयलेट में छिपकर, तो कभी बोगियों के बीच खड़े होकर सफर करते हुए. लेकिन हवाई जहाज़ में बिना टिकट बैठना सुनकर कोई भी चौंक जाएगा. और अगर कोई सीट या टॉयलेट में नहीं, बल्कि फ्लाइट के लैंडिंग गियर और टायरों के बीच छिपकर यात्रा करे, तो यह जानलेवा हैरानी से कम नहीं.
ऐसा ही एक मामला काबुल से दिल्ली आने वाली KAM एयरलाइंस की फ्लाइट (RQ-4401) में सामने आया. जानकारी के मुताबिक, अफगानिस्तान के कुंदुज शहर का एक 13 साल का किशोर फ्लाइट के लैंडिंग गियर में छिप गया और 94 मिनट की खतरनाक उड़ान के बाद दिल्ली पहुंच गया.
मौत से जंग और चौंकाने वाला बचाव
विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी ऊंचाई पर तापमान माइनस 50 से 60 डिग्री तक गिर जाता है और सांस लेना लगभग असंभव हो जाता है. ऐसे हालात में किसी का जिंदा बचना बहुत मुश्किल है. हालांकि यह पहली घटना नहीं है—1970 के दशक से अब तक ऐसे 100 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें ज़्यादातर यात्रियों की मौत हो गई.
1996 का मशहूर “सैनी ब्रदर्स केस”
इससे पहले भारत में 1996 का मामला खूब सुर्खियों में रहा था. पंजाब के रहने वाले प्रदीप और विजय सैनी नाम के दो भाई ब्रिटिश एयरवेज की फ्लाइट के लैंडिंग गियर में छिपकर लंदन जाने की कोशिश में निकल पड़े थे.
उस वक्त पंजाब में खालिस्तान समर्थकों के खिलाफ अभियान चल रहा था. दोनों भाइयों पर सुरक्षा एजेंसियों को शक था और लगातार पूछताछ की जा रही थी. परेशान होकर उन्होंने देश छोड़ने का फैसला लिया और तस्करों की मदद से फ्लाइट तक पहुंच गए.
लेकिन करीब 10 घंटे की उड़ान, 6,700 किलोमीटर का सफर और माइनस 60 डिग्री तापमान… दोनों के लिए जानलेवा साबित हुआ. बड़ा भाई प्रदीप किसी तरह बच गया, लेकिन 18 वर्षीय विजय की ठंड और ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई.
क्यों होता है इतना खतरनाक?
विशेषज्ञ बताते हैं कि फ्लाइट के लैंडिंग गियर में दबाव नहीं होता, तापमान अत्यधिक गिर जाता है और हवा बेहद पतली हो जाती है. इस कारण शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और मौत लगभग तय रहती है.
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