अमेरिका-ईरान बातचीत क्यों रही विफल? JD Vance के बयान से सामने आई बड़ी वजह

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई हाई-लेवल वार्ता के बेनतीजा रहने के पीछे अब नई वजह सामने आई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने दावा किया है कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पास समझौते को अंतिम रूप देने का अधिकार ही नहीं था, जिसके कारण बातचीत सफल नहीं हो सकी।
वार्ता में प्रगति के बावजूद नहीं बन पाया समझौता
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत के दौरान “काफी प्रगति” हुई थी और ईरान ने कुछ मुद्दों पर अमेरिका के रुख के करीब आने की कोशिश भी की। हालांकि, यह प्रगति अंतिम समझौते तक नहीं पहुंच सकी।
वेंस के अनुसार, “गेंद अब पूरी तरह ईरान के पाले में है” और आगे का फैसला तेहरान को ही लेना होगा।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पास नहीं था अंतिम अधिकार
जेडी वेंस ने यह भी संकेत दिया कि ईरान में अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद में मौजूद टीम समझौते पर हस्ताक्षर करने में सक्षम नहीं थी और उन्हें इसके लिए तेहरान से मंजूरी लेनी पड़ती।
इस वार्ता में ईरान की ओर से विदेश मंत्री Abbas Araghchi और संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf शामिल थे।
ईरान ने अमेरिका के दावे को किया खारिज
वहीं, ईरान ने अमेरिका के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अब्बास अराघची ने कहा कि दोनों देश समझौते के “बहुत करीब” पहुंच चुके थे और स्थिति “इंच भर दूरी” पर थी।
उन्होंने दावा किया कि बातचीत लगभग सफल हो चुकी थी, लेकिन अमेरिका के रुख में अचानक सख्ती आने के कारण यह प्रक्रिया टूट गई।
तनाव बढ़ाने का आरोप और ‘मैक्सिमलिज्म’ का मुद्दा
ईरान ने अमेरिका पर “मैक्सिमलिज्म” यानी अत्यधिक मांगें रखने और बार-बार शर्तें बदलने का आरोप लगाया। अराघची ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकेबंदी की घोषणा ने हालात को और बिगाड़ दिया।
इससे वार्ता का माहौल खराब हुआ और दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया।
आगे क्या होगा?
दोनों देशों के बयानों से साफ है कि वार्ता के दौरान कुछ प्रगति जरूर हुई, लेकिन गहरे अविश्वास और राजनीतिक मतभेदों के कारण समझौता नहीं हो सका।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिका और ईरान कूटनीतिक रास्ते पर आगे बढ़ते हैं या यह तनाव आने वाले समय में और बढ़ता है।





