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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान: राज्यपाल–राष्ट्रपति पर बिलों को लेकर नहीं तय की जा सकती समयसीमा

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकारों द्वारा पास किए गए बिलों पर कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल पर कोई तय समयसीमा लागू नहीं की जा सकती। पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने यह मत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए 14 संवैधानिक सवालों के जवाब में दिया है। अदालत का कहना है कि संविधान में ऐसी कोई समयसीमा का प्रावधान नहीं है और इसलिए न्यायालय भी इसे लागू नहीं कर सकता।

यह मामला तब उठा जब सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में तमिलनाडु राज्यपाल को लेकर दिए एक फैसले में राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों पर ही बिलों पर समयसीमा तय कर दी थी। इस फैसले के बाद कई संवैधानिक शंकाएँ खड़ी हुईं। उसी को देखते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने मई 2025 में अनुच्छेद 143 के तहत इस पूरे विषय पर अदालत की सलाह मांगी।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि राज्यपाल के पास किसी भी बिल पर तीन विकल्प बने रहते हैं—

पहला, बिल को मंजूरी देना;
दूसरा, बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना;
और तीसरा, बिल को वापस राज्य सरकार के पास लौटाना।
हालाँकि मनी बिल को राज्यपाल वापस नहीं लौटा सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिल पर फैसला लेते समय राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं हैं और इस प्रक्रिया में स्वतन्त्र हैं।

राज्यपाल के फैसलों पर कोर्ट का दायरा सीमित

अदालत ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी बिल को मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना—इन सभी निर्णयों पर न्यायालय सीधे सवाल नहीं उठा सकता। लेकिन अगर राज्यपाल बिना किसी उचित कारण के लंबे समय तक फाइलें रोककर रखे रहते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट उन्हें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने का आदेश दे सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिलों पर राष्ट्रपति की भूमिका भी लगभग उसी तरह की है जैसी राज्यपाल की। राष्ट्रपति को हर बार कोर्ट से सलाह लेना ज़रूरी नहीं है, बल्कि केवल उन मामलों में सलाह ली जा सकती है जहाँ संवैधानिक जटिलता हो। अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णयों पर कोई व्यक्तिगत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि किसी भी बिल पर कोर्ट तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक कि वह कानून न बन जाए। यानी बिल विधानसभा से पास होने के बाद राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास विचाराधीन हो—उस समय कोर्ट बिल की सामग्री पर टिप्पणी या समीक्षा नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यह मान लेना कि “राज्यपाल/राष्ट्रपति ने समय पर निर्णय नहीं लिया, इसलिए बिल अपने-आप पास माना जाए”—संविधान के अनुरूप नहीं है। यह सिद्धांत भारत के संवैधानिक ढांचे में लागू नहीं किया जा सकता।

इस पूरी राय का सार यह है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति महत्वपूर्ण संवैधानिक पद हैं और उन पर कोई कठोर समयसीमा लागू नहीं की जा सकती। लेकिन साथ ही, वे बिना कारण अनिश्चितकाल तक किसी बिल को रोके भी नहीं रख सकते। यह फैसला केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और संवैधानिक प्रक्रिया को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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