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भारत में प्रदूषित नदी खंड: निगरानी, प्रभावशीलता और पारदर्शिता के लिए उठाए गए कदम

भारत एक नदीप्रधान देश है, जहाँ नदियाँ केवल जल स्रोत ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की रीढ़ भी हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में तेजी से हुए शहरों का विकास, उद्योगों का बढ़ना और जनसंख्या में इज़ाफा देश की नदियों को गंदगी और प्रदूषण की गंभीर स्थिति में ले आया है। ऐसे में प्रदूषित नदी खंडों (Polluted River Stretches) की पहचान, निगरानी और सुधार की प्रक्रिया बहुत ज़रूरी हो जाती है।

प्रदूषित नदी खंड क्या होते हैं और कैसे पहचाने जाते हैं?

प्रदूषित नदी खंड से मतलब उन हिस्सों से है जहाँ नदी का पानी तय गुणवत्ता से खराब हो जाता है, खासकर जब पानी में जैविक ऑक्सीजन की ज़रूरत (BOD) ज़्यादा हो जाती है। BOD यह बताता है कि पानी में मौजूद जीवाणु कितनी ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं — यानी पानी में जैविक गंदगी कितनी है। अगर किसी नदी में BOD का स्तर 3 mg/L से ज़्यादा होता है, तो उसे “प्रदूषित” माना जाता है। जब दो या अधिक ऐसे हिस्से एक साथ होते हैं, तो उन्हें “प्रदूषित नदी खंड” कहा जाता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) इन खंडों को पांच स्तरों (Priority I से V) में बांटता है:

Priority I: BOD > 30 mg/L (सबसे खराब)

Priority II: 20–30 mg/L

Priority III: 10–20 mg/L

Priority IV: 6–10 mg/L

Priority V: 3–6 mg/L

यह श्रेणीकरण नीतियाँ बनाने और सफाई अभियान तय करने में मदद करता है।

2022–23 की रिपोर्ट: प्रदूषित नदी खंडों की स्थिति

दिसंबर 2024 में संसद में दी गई CPCB की ताज़ा रिपोर्ट (जो 2022–23 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, देश में 311 प्रदूषित नदी खंड पहचान में आए। यह संख्या 2018 में पाई गई 351 खंडों से कम है, जो यह दिखाता है कि कुछ हद तक स्थिति में सुधार हुआ है।

राज्यवार आँकड़ों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है जहाँ 55 प्रदूषित खंड पाए गए, जबकि मध्य प्रदेश में 19 खंड हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, साबरमती, क्षिप्रा और मंढाकिनी जैसी नदियों के कई हिस्से अभी भी गंभीर स्थिति में हैं। हालांकि कुछ नदी खंडों में सुधार भी हुआ है, जैसे इंद्रायणी और कुंडलिका (महाराष्ट्र) अब सबसे खराब से मध्यम स्थिति में आ गए हैं।

जल गुणवत्ता निगरानी तंत्र: मैनुअल और रियल-टाइम प्रणाली

भारत में नदी के पानी की गुणवत्ता देखने के दो मुख्य तरीके हैं:

1. मैनुअल सैंपलिंग

यह पुराना तरीका है जिसमें पानी के नमूने तय समय पर लिए जाते हैं और लैब में जांचे जाते हैं। यह तरीका BOD, DO, pH, भारी धातुएँ आदि की सटीक जांच करता है, लेकिन इसमें तुरंत जानकारी नहीं मिलती। इसी वजह से अचानक हुई गंदगी की घटनाओं का समय पर पता नहीं चलता।

2. रियल-टाइम वॉटर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम (RTWQMS)

नई तकनीकों के साथ CPCB ने ऐसे स्टेशन लगाए हैं जो हर मिनट का डेटा ऑनलाइन भेजते हैं। 2023 तक 500 से ज्यादा स्टेशन काम कर रहे थे और 2025 तक यह संख्या 700 के पार जा सकती है। ये स्टेशन pH, Conductivity, Ammonia, Turbidity जैसे मानकों की जांच करते हैं और खासतौर पर उद्योगों और शहरों में बहुत ज़रूरी हैं।

क्या निगरानी केंद्र पर्याप्त हैं, खासकर औद्योगिक और शहरी इलाकों में?

नहीं, अभी भी नहीं। CPCB और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) दोनों की रिपोर्टें कहती हैं कि कई बड़े औद्योगिक और शहरी इलाकों में निगरानी केंद्रों की संख्या बहुत कम है। जैसे नोएडा, वडोदरा, कोयंबटूर, बेलगाम और झारसुगुड़ा जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में जल की गुणवत्ता देखने के लिए रियल-टाइम स्टेशन ही नहीं हैं। वहीं बड़े शहरों में भी नालों और सीवर की निगरानी सीमित है।

वर्तमान निगरानी तंत्र की ताकत और परेशानियाँ

जहाँ एक ओर ये सिस्टम प्रदूषित इलाकों की पहचान और सफाई की योजना बनाने में मददगार हैं, वहीं इनकी कुछ कमजोरियाँ भी हैं:

मैनुअल तरीका धीरे काम करता है और तुरंत जवाब नहीं दे सकता।

रियल-टाइम सिस्टम महंगे हैं और इन्हें चलाना कठिन होता है।

कई जगहों पर डेटा आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं होता।

राज्यों में इनका इस्तेमाल और क्षमता एक समान नहीं है, खासकर जहाँ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कमजोर हैं।

डेटा की सटीकता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम

सरकार और CPCB ने हाल के वर्षों में कई अहम कदम उठाए हैं ताकि यह सिस्टम मज़बूत हो और डेटा पर भरोसा किया जा सके:

1. ऑनलाइन पोर्टल: CPCB और राज्य बोर्ड अब लाइव डेटा वाले पोर्टल दे रहे हैं जहाँ लोग खुद भी नदी की स्थिति देख सकते हैं।

2. थर्ड-पार्टी जांच: डेटा सही है या नहीं, यह जांचने के लिए बाहर की एजेंसियाँ रखी गई हैं।

3. GIS मैपिंग: निगरानी केंद्रों को नक्शों से जोड़ दिया गया है ताकि पता चले कौन सी जगह कवर हो रही है।

4. उपकरणों की जांच: सभी मशीनों को समय-समय पर जांचा जा रहा है ताकि उनका डेटा सही रहे।

5. National Water Informatics Centre (NWIC): इसके ज़रिए पूरे देश का जल डेटा एक जगह लाया जा रहा है।

भारत में प्रदूषित नदी खंडों की पहचान और निगरानी प्रणाली पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी रूप से बेहतर हुई है। रियल-टाइम निगरानी, खुले डेटा पोर्टल, थर्ड-पार्टी जांच और नक्शे आधारित विश्लेषण से पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी बढ़ी है। लेकिन अभी चुनौती यह है कि यह प्रणाली उद्योगों और शहरों तक पूरी तरह पहुँचे और लोगों की भागीदारी से एक जवाबदेह जल प्रबंधन व्यवस्था बने।

नदी प्रदूषण केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक, प्रशासनिक और नीति से जुड़ी चुनौती है। और जब तक निगरानी के साथ सख्त कार्रवाई और लोगों को जागरूक करने की नीति नहीं अपनाई जाती, तब तक केवल डेटा इकट्ठा करने से नदियाँ साफ नहीं होंगी।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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