विश्व मलेरिया दिवस: 2030 तक मलेरिया का खात्मा तय – भारत ने थामा निर्णायक मोर्चा

आज 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर पर प्रदेशभर में मलेरिया उन्मूलन को लेकर स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। मलेरिया एक परजीवी जनित बीमारी है, जो संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। इससे पीड़ित व्यक्ति को तेज़ बुखार, ठंड लगना और कमजोरी जैसी समस्याएं होती हैं।
पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। राज्य सरकार ने 2027 तक मलेरिया को पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है। इसके तहत पूरे प्रदेश में व्यापक स्तर पर जागरूकता और रोकथाम अभियान चलाए जा रहे हैं।
मलेरिया नियंत्रण अधिकारी डॉ. रितु श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि विश्व मलेरिया दिवस हर वर्ष 25 अप्रैल को मनाया जाता है। इस वर्ष 2025 की थीम है: “पुनर्निवेश, पुनर्कल्पना, पुनप्रज्वलित” (Reinvest, Reimagine, Reignite)। इस थीम का उद्देश्य मलेरिया उन्मूलन की रणनीतियों को नए सिरे से सोचकर लागू करना, नवाचार को अपनाना और फिर से जोश और समर्पण के साथ इस दिशा में कार्य करना है।
भारत मलेरिया उन्मूलन की राह पर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2024 में भारत की मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में उल्लेखनीय प्रगति की सराहना की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2017 से 2023 के बीच मलेरिया के मामलों और इससे संबंधित मौतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है – यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
भारत ने 2030 तक मलेरिया मुक्त राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है, और अब वह 2027 तक स्वदेशी मलेरिया के मामलों को शून्य करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
मलेरिया उन्मूलन में भारत की उपलब्धियाँ:
2015 से 2023 तक, मलेरिया के मामलों में लगभग 80% की गिरावट दर्ज की गई है।
2023 में, भारत में मलेरिया के मात्र 2 मिलियन मामले और 83 मौतें हुईं – जो 2017 के मुकाबले 97% से अधिक की कमी है।
स्वतंत्रता के समय (1947) भारत में मलेरिया के मामले लगभग 75 मिलियन थे, जो अब घटकर नगण्य स्तर पर पहुँच गए हैं।
डब्ल्यूएचओ की मान्यता और एचबीएचआई समूह से बाहर निकासी:
भारत की प्रगति को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है उसका WHO के ‘High Burden to High Impact (HBHI)’ समूह से 2024 में बाहर निकलना, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब मलेरिया के उच्च जोखिम वाले देशों की सूची में नहीं है।
राज्यवार प्रगति की स्थिति:
2015 में, 10 राज्य उच्च बोझ (श्रेणी-3) में थे, लेकिन 2023 तक केवल मिजोरम और त्रिपुरा ही इस श्रेणी में बचे हैं।
ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और मेघालय श्रेणी 2 में आ गए हैं, जबकि मध्य प्रदेश, अंडमान-निकोबार, अरुणाचल प्रदेश और दादरा-नगर हवेली जैसे राज्य अब श्रेणी 1 में हैं।
लद्दाख, लक्षद्वीप और पुडुचेरी ने श्रेणी-0 का दर्जा प्राप्त किया है, जहाँ कोई स्थानीय मलेरिया मामला नहीं है।
निगरानी और रणनीतियाँ:
वार्षिक रक्त परीक्षण दर (ABER) 2015 में 9.58 से बढ़कर 2023 में 11.62 हो गई है, जिससे रोग की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार संभव हुआ।
Integrated Health Information Platform (IHIP) और National Reference Laboratories (NRLs) के माध्यम से निगरानी और केस प्रबंधन को मजबूत किया गया है।
गहन मलेरिया उन्मूलन परियोजना (IMEP-3) के अंतर्गत 12 राज्यों के 159 जिलों में संवेदनशील आबादी पर फोकस किया गया है।
वेेक्टर नियंत्रण की रणनीतियाँ:
इनडोर अवशिष्ट छिड़काव (IRS) और लॉन्ग लास्टिंग इंसेक्टिसाइडल नेट्स (LLINs) ने मच्छरों की आबादी पर अंकुश लगाने में बड़ी भूमिका निभाई।
एनोफिलीज स्टेफेंसी जैसी आक्रामक मच्छर प्रजातियों के नियंत्रण ने शहरी मलेरिया प्रबंधन को सुदृढ़ किया।
नीतिगत पहल और क्षेत्रीय सहयोग:
भारत ने राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन रूपरेखा (2016-2030) और राष्ट्रीय रणनीतिक योजना (2023-2027) तैयार की है, जो ‘परीक्षण, उपचार और ट्रैकिंग’ मॉडल पर आधारित है।
प्रधानमंत्री ने 2015 में 17 एशिया-प्रशांत नेताओं के साथ मिलकर 2030 तक मलेरिया उन्मूलन के क्षेत्रीय लक्ष्य का समर्थन किया, जबकि भारत ने इसे 2027 तक हासिल करने का संकल्प लिया है – जो वैश्विक लक्ष्य से तीन वर्ष पूर्व है।
वैश्विक संदर्भ में भारत की भूमिका:
विश्व मलेरिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया में मलेरिया का तीसरा सबसे बड़ा बोझ उठाने वाला देश रहा है, और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में 89% मामलों और 90% मौतों के लिए जिम्मेदार रहा है। ऐसे में भारत की प्रगति न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी निर्णायक मानी जा रही है।





