
West Bengal: पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने चिकित्सा लापरवाही के एक महत्वपूर्ण मामले में ILS अस्पताल को 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह फैसला 2015 में हुई एक 43 वर्षीय महिला की मौत के मामले में आया है, जिसे आयोग ने ‘संस्थागत लापरवाही’ करार दिया है।
क्या थी चिकित्सा स्थिति?
पीड़िता को आंतों में रुकावट (intestinal obstruction) और गंभीर एसोफेजियल समस्या से जूझना पड़ा था, जिसके लिए उन्नत कार्डियो-थोरैसिक हस्तक्षेप (cardio-thoracic intervention) की आवश्यकता थी। वादी के अनुसार, अस्पताल ने अपनी सीमित सुविधाओं के बावजूद इलाज जारी रखा और अंत में मरीज को अपोलो अस्पताल जैसे उच्च केंद्रों में स्थानांतरित करने की सलाह दी।
विवाद का मुख्य बिंदु
पीड़िता के पति ने आरोप लगाया कि CT स्कैन के बाद दोपहर 12:30 बजे ही ट्रांसफर का निर्णय ले लिया गया था, लेकिन डिस्चार्ज प्रक्रिया शाम 4:40 बजे तक पूरी हुई। इस दौरान अस्पताल ने न तो कोई एम्बुलेंस उपलब्ध कराई और न ही कोई सहयोग किया। पति ने यह भी दावा किया कि मेडिकल स्टाफ ने इस नाजुक समय में उपचार के बजाय वित्तीय चिंताओं (financial implications) का बोझ उन पर डाला, जिससे जीवन रक्षक ‘गोल्डन आवर’ बर्बाद हुआ।
अस्पताल का पक्ष
दूसरी ओर, अस्पताल और संबंधित डॉक्टरों की ओर से अधिवक्ता बिनोटा रॉय और मौशुमी सरकार ने तर्क दिया कि डॉक्टरों ने अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया और महिला को स्थिर करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अस्पताल की किसी भी तरह की सेवा में कमी से इनकार किया।
आयोग का फैसला
न्यायमूर्ति बिभास रंजन डे और सदस्य मृदुला रॉय की पीठ ने अस्पताल की दलीलों को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि अस्पताल केवल ट्रांसफर की सलाह देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। एम्बुलेंस की कमी और प्रशासनिक देरी को ‘गंभीर चूक’ मानते हुए आयोग ने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन बताया और अस्पताल को दोषी ठहराया।





