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अमेरिकी टैरिफ के एक साल बाद भी भारत की तस्वीर क्या बदली? अमेरिका से कारोबार पर क्या हुआ असर

अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर भारत के सामने पिछले एक साल में कई चुनौतियां आईं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ाई और भारत को अपने व्यापारिक रिश्तों में विविधता लाने पर जोर देना पड़ा। लेकिन एक साल बाद उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि तमाम दबाव के बावजूद अमेरिकी बाजार में भारत की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है।

व्यापार मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर पिछले 12 महीनों की तस्वीर देखें तो भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत बनी हुई है। यानी अमेरिकी शुल्क बढ़ने और व्यापारिक अनिश्चितता के बावजूद भारत के लिए अमेरिका अब भी सबसे अहम निर्यात बाजारों में शामिल है।

टैरिफ बढ़ा, फिर घटा

पिछले एक साल में भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क कई बार बदला। एक समय यह 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। बाद में इसमें कमी की गई और अब भारतीय सामान पर 10 प्रतिशत शुल्क है। इस बदलाव ने भारतीय निर्यातकों को राहत तो दी है, लेकिन अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर अनिश्चितता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

अमेरिका भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयों, कपड़ा और आभूषण जैसे कई प्रमुख उत्पादों के लिए बड़ा बाजार है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है।

क्या भारत ने दूसरे बाजार तलाशे?

अमेरिकी शुल्क बढ़ने के बाद भारत ने दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिश तेज की। पिछले एक साल में ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौता हुआ, जबकि यूरोपीय संघ, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापार संबंधों को आगे बढ़ाने पर काम हुआ।

भारत का मकसद साफ है—किसी एक देश के बाजार पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कम करना और भारतीय सामान के लिए नए बाजार तैयार करना।

सरकार ने विदेशों में भेजे जाने वाले सामान की सूची को भी बढ़ाया है। करीब 500 नए उत्पादों को इसमें शामिल किया गया है, जिनमें मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और समुद्री उत्पाद शामिल हैं।

फिर भी अमेरिका की जगह लेना आसान नहीं

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अमेरिका जैसे विशाल बाजार का विकल्प तुरंत तैयार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार को नए बाजारों की ओर मोड़ने में कम से कम दो से तीन साल लग सकते हैं।

आंकड़े भी बताते हैं कि दूसरे बाजारों में भारत की मौजूदगी बढ़ रही है। ऑस्ट्रेलिया भारत के तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हो गया है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात पिछले 12 महीनों में भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा।

चीन को भारत का निर्यात भी इस दौरान 42 प्रतिशत बढ़ा। हालांकि, भारत ने चीन को करीब 21.5 अरब डॉलर का सामान भेजा, जबकि अमेरिका को निर्यात करीब 88.5 अरब डॉलर रहा। इससे साफ है कि अमेरिकी बाजार का पैमाना अभी भी बहुत बड़ा है।

भारत के लिए आगे की राह क्या है?

अमेरिकी टैरिफ विवाद ने भारत के सामने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या निर्यात के लिए किसी एक बड़े बाजार पर निर्भर रहना सही रणनीति है?

फिलहाल भारत का जवाब व्यापार का दायरा बढ़ाने के रूप में सामने आया है। यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के दूसरे बाजारों के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा है।

हालांकि, आंकड़े यह भी बताते हैं कि अमेरिकी बाजार को छोड़ना या उसकी जगह किसी दूसरे बाजार को तुरंत खड़ा करना आसान नहीं होगा। एक साल के बाद भी भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।

इसलिए भारत के लिए चुनौती सिर्फ नए बाजार तलाशने की नहीं, बल्कि अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखते हुए दुनिया के दूसरे बाजारों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की है। यही संतुलन आने वाले वर्षों में भारत की व्यापार रणनीति के लिए सबसे अहम होगा।

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न्यूज़ मोबाइल ब्यूरो

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