कब तक? आतंकवाद की त्रासदी को चीरता एक दिल दहला देने वाला उपन्यास

देवेंद्र नारायण का उपन्यास ‘कब तक?’ आतंकवाद के विषय पर लिखी गई एक असाधारण कृति है जो पाठकों को झकझोर कर रख देती है. यह रचना पाकिस्तानी शासन तंत्र की मानसिकता, जिहादी संगठनों की कार्यप्रणाली और आतंकवादियों के परिवारों की पीड़ा को बेहद संवेदनशीलता के साथ उकेरती है.
पुलवामा और बालाकोट की पृष्ठभूमि
उपन्यास की कथा पुलवामा हमले और उसके बाद भारत द्वारा किए गए बालाकोट एयरस्ट्राइक की घटनाओं पर आधारित है. कहानी के केंद्र में सलमा नामक एक पाकिस्तानी युवती है, जिसकी जीवन यात्रा आत्मसंघर्ष और सत्य की खोज से भरी हुई है.
सलमा के जीवन में तब भूचाल आता है जब भारतीय एयर स्ट्राइक में उसके पिता मारे जाते हैं, जिन्हें आईएसआई ने आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से बालाकोट में तैनात किया था. समय के साथ सलमा एक कठोर वास्तविकता से रूबरू होती है – असली अपराधी वे नहीं जिन्होंने एयर स्ट्राइक को अंजाम दिया, बल्कि वे हैं जो आतंकवादियों को प्रशिक्षित कर कश्मीर की ओर भेजते हैं. क्योंकि अगर यह सब नहीं होता, तो भारत को प्रतिकार करने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इस अहसास के साथ उसके मन में बदले की भावना जन्म लेती है, और वह अपने तरीके से प्रतिशोध भी लेती है.
पात्रों की मनोवैज्ञानिक गहराई
देवेंद्र नारायण ने जीवंत चित्रण और स्वाभाविक संवादों के जरिए आतंकवाद, धर्म, मानसिक षड्यंत्र और मानवीय संवेदनाओं जैसे जटिल विषयों को छुआ है. सलमा का भीतरी संघर्ष – जहां तर्क और क्रोध, मानसिक संताप और आत्म-नियंत्रण आपस में टकराते हैं – कथानक को अद्भुत गहराई और मानवीयता प्रदान करता है.
उपन्यास में अन्य महत्वपूर्ण किरदार भी हैं जो कहानी को समृद्ध बनाते हैं: दुःख और पीड़ा से भरी फ़ातिमा बी; आईएसआई की गुप्तचर फिज़ा; करुणा और बुद्धिमत्ता की मूर्ति डॉ. सीता चंद्रा; और अशोक गौतम, जो इस्लाम को त्यागकर बौद्ध धर्म की राह अपनाते हैं. ये सभी पात्र कथा की मनोवैज्ञानिक परतों को और गहरा करते हैं.
साहित्यिक और सिनेमाई संगम
लेखक की शैली साहित्यिक सुंदरता और सिनेमाई असर का अनूठा मिश्रण है. नारायण आतंकवाद के पीछे छुपे असली चेहरों को कुशलता से सामने लाते हैं. यह उपन्यास भावनात्मक कथा को कठोर सच्चाई और विचारपूर्ण टिप्पणियों के साथ संतुलित करता है, जो उग्रवाद, आस्था और मानवता पर गंभीर मंथन के लिए प्रेरित करता है.
प्रासंगिक प्रश्न
‘कब तक?’ शीर्षक खुद में एक शक्तिशाली सवाल है जो हर संवेदनशील इंसान के दिल में गूंजता है: “आखिर यह आतंक और नफरत का दौर कब तक जारी रहेगा?” उपन्यास में सलमा का मानना है कि यदि प्रभावशाली राष्ट्रों के नेता चाहें तो पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियां तुरंत बंद हो सकती हैं.
यह उपन्यास कौटिल्य बुक्स द्वारा प्रकाशित किया गया है.
लेखक के बारे में
85 वर्षीय देवेंद्र नारायण भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेखक हैं. वे जटिल मुद्दों को सरल, मानवीय और संवेदनशील ढंग से पेश करने में माहिर हैं. 1980 और 90 के दशकों में उनके आर्थिक विषयों पर लेख, कहानियां और अंग्रेजी व हिंदी में व्यंग्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपे थे.
विभिन्न विषयों पर उनके लेख और व्यंग्य उनकी वेबसाइट www.devendranarain.com पर पढ़े जा सकते हैं. उनकी तीन पुस्तकें – कहानी संग्रह “ये टेढ़े मेढ़े रास्ते”, लेखों का संग्रह “दी कांग्रेस फाइल्स”, और विज्ञान कथा “शिवाज फायर इन दी स्काई” – किंडल संस्करण में अमेज़न पर उपलब्ध हैं.
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