डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगी की कोशिश, बैंक अधिकारी की सतर्कता से बचे ₹30 लाख

अहमदाबाद में बैंक अधिकारी की सतर्कता से एक बुजुर्ग व्यक्ति के करीब 30 लाख रुपये डिजिटल अरेस्ट स्कैम की चपेट में आने से बच गए। ठगों ने बुजुर्ग को कई दिनों तक डराकर और कानूनी कार्रवाई का झांसा देकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया था। यह मामला अहमदाबाद की SVC को-ऑपरेटिव बैंक की शाखा का है। बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर रविंद्र सिंह ने घटना की जानकारी साझा की। बुजुर्ग का खाता बैंक की मुंबई शाखा में है और वह अहमदाबाद की शाखा में करीब 30 लाख रुपये का RTGS करने पहुंचे थे।
शाखा में मौजूद असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर ने देखा कि बुजुर्ग काफी परेशान नजर आ रहे थे। अधिकारी ने सामान्य तरीके से ट्रांजैक्शन करने के बजाय उनसे इतनी बड़ी रकम भेजने की वजह पूछी। बातचीत के दौरान सामने आया कि वह साइबर ठगों के जाल में फंस चुके थे।
बताया गया कि ठगों ने खुद को सरकारी अधिकारी बताकर बुजुर्ग को एक गंभीर कानूनी मामले में फंसने का डर दिखाया था। करीब एक हफ्ते से उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। इस दौरान उन्होंने एक बड़े सरकारी बैंक में मौजूद खाते से करीब 4 लाख रुपये भी जुटा लिए थे।
ठगों ने उन्हें अपनी बचत और निवेश निकालकर बताए गए खाते में पैसे भेजने के लिए कहा था। उनकी बातों में आकर बुजुर्ग ने म्यूचुअल फंड समेत अपनी जमा पूंजी का एक बड़ा हिस्सा निकाल लिया। इसके बाद वह पैसे RTGS के जरिए ट्रांसफर करने अहमदाबाद की बैंक शाखा पहुंचे।
हालांकि, बैंक कर्मचारियों की बातचीत के बाद पूरा मामला सामने आ गया और टीम ने ट्रांजैक्शन रोक दिया। बैंक ने बुजुर्ग को समझाया कि वह साइबर फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं। इसके साथ ही पुलिस और साइबर क्राइम अधिकारियों के पास शिकायत करने में भी उनकी मदद की गई।
इस घटना से यह भी पता चलता है कि बैंकिंग में तकनीक के साथ कर्मचारियों की सतर्कता भी काफी अहम है। किसी ग्राहक के सामान्य लेनदेन की जानकारी होने पर अचानक होने वाले बड़े ट्रांजैक्शन को देखकर बैंक कर्मचारी सवाल उठा सकते हैं। इस मामले में समय रहते की गई एक बातचीत ने बुजुर्ग को अपनी करीब 30 लाख रुपये की मेहनत की कमाई गंवाने से बचा लिया। यह घटना बताती है कि डिजिटल सिस्टम के साथ-साथ बैंक कर्मचारियों की मानवीय निगरानी भी साइबर ठगी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





