एआई डीपफेक से बढ़ा ‘बॉस स्कैम’ का खतरा, फर्जी सीईओ बनकर हो रही लाखों की ठगी

नई दिल्ली: साइबर अपराधी अब कंपनियों के सीईओ और बड़े अधिकारियों की नकली पहचान बनाकर कर्मचारियों को ठग रहे हैं। इसके लिए फर्जी प्रोफाइल, एआई डीपफेक, आवाज की नकल और मैलवेयर जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। साइबर ठगी के इस नए तरीके को ‘बॉस स्कैम’ कहा जा रहा है।
इस ठगी में अपराधी खुद को कंपनी के सीईओ, मैनेजिंग डायरेक्टर या किसी वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पेश करते हैं। इसके बाद वे व्हाट्सऐप, ईमेल, माइक्रोसॉफ्ट टीम्स या सोशल मीडिया के जरिए कर्मचारियों से संपर्क करते हैं। खासतौर पर वित्त और अकाउंट से जुड़े कर्मचारियों को निशाना बनाया जाता है, क्योंकि उनके पास कंपनी के पैसों से जुड़े काम की जिम्मेदारी होती है।
कैसे होता है बॉस स्कैम?
सबसे पहले साइबर अपराधी कंपनी के किसी बड़े अधिकारी के बारे में सोशल मीडिया, कंपनी की वेबसाइट और दूसरी सार्वजनिक जगहों से जानकारी जुटाते हैं। इसके बाद उनके नाम और तस्वीर का इस्तेमाल करके फर्जी अकाउंट या ईमेल आईडी बनाई जाती है।
कर्मचारी को संदेश भेजकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने, किसी नए बैंक खाते में भुगतान करने या किसी इनवॉइस का भुगतान करने के लिए कहा जाता है। कई बार कर्मचारी से इस लेनदेन को गोपनीय रखने के लिए भी कहा जाता है।
ठग जानबूझकर जल्द से जल्द कार्रवाई करने का दबाव बनाते हैं, ताकि कर्मचारी अनुरोध की सही तरीके से जांच न कर पाए।
एआई और डीपफेक ने बढ़ाया खतरा
पहले इस तरह की ठगी ज्यादातर फर्जी ईमेल और प्रोफाइल के जरिए की जाती थी। अब साइबर अपराधी एआई तकनीक का इस्तेमाल करके इसे और ज्यादा असली दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।
अपराधी किसी व्यक्ति की आवाज की नकल कर सकते हैं और डीपफेक वीडियो के जरिए ऐसा दिखा सकते हैं कि कंपनी का अधिकारी खुद कर्मचारी से बात कर रहा है। इसलिए केवल आवाज सुनकर या वीडियो कॉल देखकर भी किसी वित्तीय अनुरोध को सही मानना सुरक्षित नहीं है।
मैलवेयर के जरिए भी हो सकती है ठगी
बॉस स्कैम में मैलवेयर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। अपराधी कभी-कभी जिप फाइल के अंदर खतरनाक फाइल भेजते हैं। अगर कर्मचारी इसे कंप्यूटर में खोलता है तो डिवाइस संक्रमित हो सकता है और व्हाट्सऐप वेब से जुड़ी जानकारी भी खतरे में पड़ सकती है।
इसके बाद अपराधी उस अकाउंट का इस्तेमाल दूसरे कर्मचारियों से संपर्क करने और पैसों से जुड़े निर्देश भेजने के लिए कर सकते हैं। कई बार ठग अपने नंबर को सीईओ या मैनेजिंग डायरेक्टर के नाम से सेव करके भी पहचान छिपाने की कोशिश करते हैं।
कर्मचारी कैसे बचें?
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, सिर्फ इसलिए पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए क्योंकि संदेश किसी बड़े अधिकारी के नाम से आया है। किसी भी असामान्य या जल्दबाजी वाले भुगतान से पहले उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए।
कर्मचारियों को सलाह दी गई है कि वे:
- अधिकारी को किसी पुराने और भरोसेमंद नंबर पर फोन करके अनुरोध की पुष्टि करें।
- ईमेल आईडी, फोन नंबर और बैंक खाते की जानकारी ध्यान से जांचें।
- तुरंत भुगतान करने के दबाव वाले संदेशों से सावधान रहें।
- नए बैंक खाते या लाभार्थी की जानकारी की अलग से पुष्टि करें।
- अनजान जिप या संदिग्ध फाइल को न खोलें।
- पासवर्ड, ओटीपी, पिन और बैंकिंग जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
- व्हाट्सऐप वेब के पुराने और अनजान सेशन को लॉग आउट करें।
- कंपनी के भुगतान से जुड़े सुरक्षा नियमों का पालन करें, भले ही अनुरोध किसी वरिष्ठ अधिकारी के नाम से आया हो।
ठगी होने पर तुरंत करें शिकायत
अगर किसी व्यक्ति के साथ साइबर ठगी हो गई है या उसने गलती से पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं, तो उसे तुरंत शिकायत करनी चाहिए। भारत में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के जरिए की जा सकती है। इसके अलावा 1930 साइबर अपराध हेल्पलाइन पर भी संपर्क किया जा सकता है।
ठगी की जानकारी जितनी जल्दी दी जाएगी, पैसे को ट्रैक करने या उसे आगे जाने से रोकने की संभावना उतनी ही बेहतर हो सकती है।
‘बॉस स्कैम’ की सबसे बड़ी ताकत लोगों का भरोसा है। किसी अधिकारी का नाम, फोटो, ईमेल या यहां तक कि एआई से बनाई गई आवाज भी यह साबित नहीं करती कि पैसों से जुड़ा अनुरोध असली है। इसलिए किसी भी संदिग्ध भुगतान से पहले रुकें, स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें और फिर ही कार्रवाई करें।





