AI और पारंपरिक खेती मिलकर कर सकती हैं काम, Google डीपमाइंड के अधिकारी ने कृषि मॉडल पर रखी अपनी बात

भारत में खेती और तकनीक का रिश्ता तेजी से बदल रहा है। गूगल डीपमाइंड (Google DeepMind) के कृषि और स्थिरता अनुसंधान प्रमुख आलोक तालेकर का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और पारंपरिक खेती एक साथ मिलकर चल सकती हैं। देश के किसानों को बेहतर फैसले लेने में तकनीक मदद कर रही है।
पारंपरिक खेती और एआई का मेल
भारत के किसान सदियों से मौसम, बाजार के भाव और फसलों की पैदावार से जुड़े फैसले अपने पारंपरिक अनुभवों के आधार पर लेते आए हैं। लेकिन अब तकनीक का दायरा बढ़ रहा है। गूगल डीपमाइंड की एंथ्रोक्रिशी (AnthroKrishi) टीम ऐसे एआई मॉडल तैयार कर रही है जो उपग्रह (satellite) की तस्वीरों के जरिए खेतों की सटीक जानकारी देते हैं। इससे किसानों को बुआई से लेकर कटाई तक सही समय पर सही फैसले लेने में मदद मिलती है।
व्यक्तिगत स्तर पर सटीक डेटा की जरूरत
आलोक तालेकर के अनुसार, भारत जैसे डेटा-सीमित देश में तकनीक की बहुत बड़ी भूमिका है। सरकारी नीतियां और रिकॉर्ड अक्सर जिला स्तर पर बनते हैं, जो हर एक किसान की व्यक्तिगत जरूरत को पूरा नहीं कर पाते। एआई की मदद से खेतों की मैपिंग और फसलों की निगरानी सीधे तौर पर की जा सकती है, जिससे किसानों का खर्च भी कम होता है।
गूगल की दोहरी लेयर वाली तकनीक
गूगल डीपमाइंड की टीम ने दो लेयर वाला एक खास एआई सिस्टम विकसित किया है। पहली लेयर 15 साल की सैटेलाइट तस्वीरों का उपयोग करके खेतों, पेड़ों और जल स्रोतों की मैपिंग करती है। वहीं दूसरी लेयर 12 प्रमुख फसलों के प्रकार, बुआई और कटाई के चरणों को ट्रैक करती है। यह डेटा गूगल अर्थ (Google Earth) पर भी उपलब्ध कराया जाता है।
पर्यावरण और जल संरक्षण पर जोर
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कुछ पुरानी पारंपरिक प्रथाएं, जैसे धान के खेतों में अत्यधिक पानी भरना, पर्यावरण और जल संसाधनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। एआई का उद्देश्य किसानों को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर डेटा और सटीक जानकारी देकर उनकी लागत को कम करना और पैदावार बढ़ाना है।





